मौत की रात | भाग – १

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कोंकण के एक छोटे से गांव, नागोठणे, में आए हमें पांच साल हो गए थे। कुछ साल बाद हमें कोंकण का यह गांव अच्छा लगने लगा। हमने लगभग वहीं बसने का फैसला कर लिया था। चूंकि मेरे पिता वन विभाग में प्रभागीय वन अधिकारी थे, इसलिए हर तीन या चार साल में हमारा तबादला हो जाता था। जैसे–जैसे हम बच्चों की दोस्ती मजबूत और स्थायी होने लगती थी, हम एक बार फिर जड़ों से उठ जाते थे और फिरसे एक नया गाँव, नए पड़ोसी, नया स्कूल, नए दोस्त और पुरानी यादों का कभी न भूलने वाला दुःख जिसे मिटने में बहुत समय लगता था।

हम भाई–बहनों को हर कुछ वर्षों में नए दोस्त बनाने में कठिनाई होती थी। क्योंकि पुरानी दोस्ती की यादें हमारे दिमाग में ताज़ा रहती थीं। हमारे लिए, हर कुछ वर्षों में होने वाले ये बदलाव मानसिक रूप से थका देने वाले थे। नई दोस्ती के बीज बोने के साथ–साथ, पुरानी दोस्ती की जड़ों का दर्दनाक खिंचाव अभी भी दिल में गहरा  होता था। नई जगह ट्रांसफर होने के बाद कुछ दिनों तक हम पुराने दोस्तों से पत्र–व्यवहार करते रहते थे । ‘एपिसोड’ में नई जगह के लोगों, दोस्तों, स्कूल, गांव से लेकर पुराने दोस्तों को ‘अपडेट’ दिया जाता था । धीरे–धीरे, स्कूल में नए दोस्त बनने के बाद सब कुछ ठीक हो जाता था ।

मैं उस समय कॉलेज के प्रथम वर्ष में था। मेरी दो बड़ी बहनें नर्सिंग कोर्स के लिए जसलोक अस्पताल और जे.जे. अस्पताल मुंबई में छात्रावास में रह रही थीं। घर पर मैं, माँ और मेरी छोटी बहन हम तीन ही हुआ करते थे ।  उस वर्ष, एक बार फिर, हमारे पिता का स्थानांतरण खोपोली में हो गया था । लगातार के बदलाव से तंग आकर हम भाई–बहनों ने जमकर विरोध किया । “नया स्कूल, नया गाँव, फिर से नए दोस्त? हम इसे और नहीं सह सकते!”

हमारे पिता हमारी मानसिक पीड़ा की गहराई को समझते थे। उन्होंने तय किया कि वे अकेले खोपोली जाएंगे, सप्ताह के दौरान काम करेंगे और हर शनिवार और रविवार को घर लौटेंगे। उनके इस फैसले से हमारे दिल में उनके लिए प्यार और सम्मान और भी बढ़ गया।

सौभाग्य से, मुझे और मेरे सभी भाई–बहन को उस गाँव में बहुत अच्छे दोस्त मिल गए और वह दोस्ती आज भी कायम हैं। हर शाम, स्कूल के बाद, हम मित्र गांव में टहलने जाते थे। गाँव का क्षेत्रफल छोटा था तथा बस्ती की व्यवस्था समुदाय के अनुसार थी। ब्राह्मण अली, अंगार अली, कुम्हार अली, गुरव अली जैसे वर्ग थे।  मुस्लिम बस्ती मोहल्ला में थी।

गाँव के बाहर अम्बा नदी बह रही थी। इसके ऊपर 1580 में निज़ामशाही काल के दौरान चूना पत्थर से बनाया गया एक पुल था। यह केवल इतना  ही चौड़ा था कि एक समय में एक ही वाहन एक तरफ से गुजर सके। शाम को टहलने के बाद हम दोस्त पुल के किनारे बैठकर बातें करते और किसी वाहन के आने पर दोनों पैर किनारे पर पूल के कटघरे पर लेकर ‘रोमांच‘ महसूस करते। असल में यह जवानी का मूर्खतापूर्ण आनंद था, और क्या? क्योंकि उस स्थिति में कोई सहारा नहीं था और एक तरफ गाड़ी हुआ करती थी और दूसरी तरफ नदी । यदि कोई पुल से गिरता है, तो सीधे नदी में। सौभाग्य से, ऐसा कभी नहीं हुआ। पूल का कटघरा बमुश्किल इतना ही चौडा थी कि एक आदमी उस पर बैठ सके।

इस अम्बा नदी के तट टूट गये थे । हर साल मानसून के मौसम में इस अम्बा नदी में बाढ़ आ जाती थी और बाढ़ का पानी गावं के एस.टी. स्टैंड और मछवारों की बस्ती तक पहुँच जाता था। हालाँकि माल का नुक्सान होता था , लेकिन कभी कोई जानहानि नहीं हुई। इसलिए, नदी में बाढ़ आने के बाद, ग्रामीण भारी बारिश में भी बाढ़ को देखने के लिए बाहर आते थे और वे इस बात पर बहस करते थे कि इस साल की बाढ़ पिछले साल की बाढ़ से कितनी अधिक या कम है, पिछले साल पानी कहाँ तक पहुँचा था वगैरे वगरे।

रविवार साप्ताहिक बाज़ार का दिन था। बाजार बहुत बड़ी मात्रा में भरता था।आसपास के सभी गांवों से ग्रामीण बड़ी संख्या में बाजार में आते थे। बरसात के दिनों में लोग बड़ी मात्रा में खरीदारी करते थे और दुकानदार भी बाजार से दो दिन पहले ही जरूरी सामान का ‘स्टॉक’ कर लेते थे।

उस दिन यानी शनिवार 22 जुलाई 1989 को बारिश का मिजाज कुछ अलग था। शाम से ही भारी बारिश हो रही थी। अगले दिन रविवार को बाजार का दिन होने के कारण दुकानदार अपनी दुकानों में जरूरी सामान रखकर सो गए।

रात के दौरान पूरे कोंकणपट्टी में बारिश की तीव्रता अचानक बढ़ गई। रायगढ़, रत्नागिरी और आसपास के इलाकों में भारी बारिश शुरू हो गई। बिजलियाँ कड़कने लगी और तेज़ हवा के साथ बारिश होने लगी। कोंकण के इस क्षेत्र में अभूतपूर्व बारिश होने लगी थी। लेकिन प्रकृति के इस रुद्रावतार को देखने के लिए कोई जाग नहीं रहा था।

उस समय ग्राम पंचायत ने रात में गांव में गश्त के लिए गोरखाओं को नियुक्त किया था। रात में किसी समय उनकी सीटियों और चिल्लाने की आवाज से कुछ लोग जाग गये। अंबा नदी में बाढ़ आयी थी और बाढ़ का पानी बस स्टैंड की सीमा पार कर गांव में घुसने लगा था। पानी का तेज बहाव देखकर लोगों ने तुरंत पड़ोसियों को जगाना शुरू कर दिया और अपने घरेलू सामान को सुरक्षित स्थान पर ले जाना शुरू कर दिया। लेकिन बहुत देर हो चुकी थी। पानी तेजी से गांव में घुस रहा था और बाजार तथा आसपास की बस्तियां पानी में समाती जा रही थीं। लोग जान बचाने के लिए गांव के पूरब की ओर भागे। जो लोग घर से बाहर नहीं निकल सके उन्होंने घर की छत पर शरण ली। बाढ़ के पानी ने चंद मिनटों में ही पूरे बाजार और आसपास के इलाके को जलमग्न कर दिया।

सुबह करीब साढ़े सात बजे हमारे घर के दरवाजे पर दस्तक हुई। पिताजी ने दरवाज़ा खोला। बाहर दरवाजे पर एक परिचित परिवार खड़ा था। उनका बड़ा बेटा परिवार का मुखिया था। उसके पिता गुजर गये थे। पांच-छह लोग थे। सभी लोग सर से पाँव तक  भीगे हुए थे और हमने उन्हें अंदर ले लिया।

“हमारा घर पानी में डूबा हुआ है, सर। क्या हम कुछ दिन आपके यहाँ रह सकते हैं?”

“बेशक !! लगता है कल रात से बहुत बारिश हुई है” पिताजी बोले।

हम गांव के ऊपरी हिस्से में रहते थे। रात में बाढ़ की इस स्थिति का हमें कोई अंदाज़ा नहीं था। हम जिस घर में रह रहे थे, वहां से बाढ़ का पानी करीब पांच सौ मीटर दूर आ गया था। इसलिए हमारा क्षेत्र सुरक्षित था। दरअसल उस गांव में हमें कोई सरकारी बंगला या क्वार्टर नहीं मिला था। तो हम उस मकान में किराये पर रहते थे। यह दस गुणा सोलह माप के दो कमरोंऔर एक रसोईघर ऐसा ‘सेटअप’ था।

अब इतने छोटे से घर में छह नये लोग जुड़ गये थे। माँ ने भी सबका स्वागत किया और चाय रखने अन्दर चली गयी। उसने उस परिवार की महिलाओं को अंदर बुलाया और कपड़े बदलने को कहा। वे लोग पहने हुए कपड़े पर ही  घर से बाहर भागे थे । माँ ने उन्हें अपनी साड़ियां अलमारी से निकाल कर दी और सबके लिए चाय बनाई।

“सर, मेरी बहन अपने छोटे बच्चे के साथ हमारे घर के ऊपरी मंज़िल पर फंसी हुई है।” बड़े लड़के ने कहा। 

यह सुनकर हमारे पिताजी और हम सब स्तब्ध रहा गए । 

 

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