रात से ही सीढ़ियाँ गंदे पानी में डूबी हुई थीं, इसलिए सीढ़ि कीचड़ से सनी हुई थीं। मैं बड़ी सावधानी बररते हुए उस फिसलन भरी सीढ़ियों की पायदाने से ऊपरी मंज़िल में चढ़ गया।
अब तक यह पूरा घटना क्रम पंद्रह से बीस मिनट का था। बह जाने की प्रबल संभावना के बावजूद, मैंने बाढ़ के पानी में घुसने का साहस किया और आंशिक रूप से डूबे हुए घर तक सुरक्षित पहुँच गया था, लेकिन अब, जब मैं फिसलन भरी पायदाने चढ़ रहा था, तो मेरे मन में एकमात्र विचार यह था कि इस महिला और उसके बच्चे को कैसे सुरक्षित बाहर निकाला जाए।
जैसे ही मैं फिसलन भरी पायदाने चढ़कर उस महिला के पास पहुंचा, उसका धैर्य बढ़ गया ।
“चिंता मत करो..,” मैंने उससे कहा, लेकिन सच तो यह था कि मेरा खुद का आत्मविश्वास अब डगमगाने लगा था। उस घर का निर्माण अधिकतर लकड़ी से किया गया था। इसलिए इस बात की कोई गारंटी नहीं थी कि यह बाढ़ के पानी में कितनी मजबूती से खड़ा रहेगा और अब हमें फिसलन भरी सीढ़ियों से नीचे उतरना था।
“तुम बच्चे को ले लो , मैं तुम्हारे पीछे चलूँगा।” मैंने उससे कहा.
लेकिन उसने कहा, “मैं नहीं कर सकती, बच्चे को तुम ले लो, मैं तुम्हारे पीछे चलूंगी।”
सोचने का समय नहीं था। मैंने उसके हाथ से बच्चा ले लिया और हम सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे।
“सीढ़ियाँ संभलकर उतरना, सीढ़ियों पर कीचड़ है” मैंने उसे सावधान रहने की चेतावनी दी।
उस सीढ़ी की पायदाने, आंशिक रूप से कीचड़ भरे पानी में डूबी हुई थी और ठीक से दिखाई नहीं दे रही थीं। हैरानी की बात यह थी कि मेरे दोनों हाथ बच्चे को पकड़ने में लगे हुए थे। मैं बहुत सावधानीसे उन फिसलन भरी पायदाने से नीचे उतर रहा था । थोड़ी सी भी गलती बहुत महंगी पड़ जाती ।
ओसरी के दरवाजे पर अभी भी पानी सीने तक था। पानी के स्तर और दरवाजे की ऊपरी पट्टी के बीच ढाई फीट का अंतर था। पानी महिला की ठुड्डी तक आ गया था। पानी में फंसने से बेहतर था कि वहां से निकल जाना। मैंने बच्चे को अपनी बांहों में उठाए हुए, दरवाजे की ढाई फुट की खाली जगह से बाहर निकाला।
अब असली समस्या यह थी कि मेरे दोनों हाथ बच्चे को संभालने में लगे हुए थे। एक हाथ उसकी गर्दन के नीचे था और एक हाथ उसकी पीठ के निचे था। वो औरत मेरी कमर पकड़ कर मेरे पीछे आ रही थी। मैंने बच्चे को अपने सिर पर उठा लिया। उसकी माँ ने उसे कम्बल में लपेट दिया था । वह कम्बल भी अब बारिश से गीला हो गया था। जैसे हि बच्चे के मुहपर बारिश गिरी, बच्चा हाथ पैर जोर जोर से हिलाकें रोने लागा । इस वजह से उसको संभालना और मुश्किल हो गया ।
जैसे-जैसे हम आगे बढ़े, बच्चे की माँ अपना सिर पानी के ऊपर रखने के लिए संघर्ष करने लगी। उसके मुँह तक पानी आने लगा। वह डर कर कुछ चिल्ला रही थी। लेकिन अब ध्यान देने का समय नहीं था। मेरा पूरा ध्यान अब बच्चे पर केंद्रित था। जरा सी चूक भी बहुत महंगी पड़ सकती थी। हम धारा के बीच में थे। महिला अपने सिर को पानी के ऊपर रखने की कोशिश करते हुए मेरे कंधों पर हाथ रखने की कोशिश कर रही थी और उस वजह से मेरे लिए अपना संतुलन बनाए रखना बहुत मुश्किल हो रहा था।
लगातार बच्चे को अपने सिर पर रखे हुए मेरी बाहें थकने लगी थी और इसके अलावा बच्चे की माँ के हाथ मेरे कंधों पर थे इससे मेरे कंधों और पीठ में भी अकड़न होने लगी थी । पानी के बीच से गुजरते समय बहाव के कारण संतुलन बनाना मुश्किल हो रहा था और अचानक मेरा पैर फिसल गया और मैं अपना संतुलन खो बैठा।
जैसे ही मैंने अपना संतुलन खोया, बच्चे को पकड़ने वाले दोनों हाथों में से एक हाथ की पकड़ पल भर के लिए छूट गयी , लेकिन मैंने खुद को सँभालते हुए बच्चे को फिर से पकड लिया और अब जैसे ही मैं पानी में गिरने वाला था, बच्चे की मां ने मुझे पीछे से पकड़के संभल लिया। मेरे दिल की धड़कन मानो क्षणभर के लिए रुक गयी थी। सड़क पर खड़े लोग जोर से चिल्लाये। और मुझे सलाह देने लगे की कि मैं संभल के चलू । हम अपने आप को संभलकर कुछ क्षणों के लिए वहीं खड़े रहे और फिर से चलना शुरू कर दिया। लेकिन उस संघर्ष में उस औरत को अपनी नाक मुँह में बहुत सारा पानी लेना पड़ा।
कुछ देर बाद हम सुरक्षित रूप से पानी से बाहर निकले और सड़क के किनारेपर आ गए । मैंने बच्चे को उसके चाचा को सौंप दिया। वह दोनों हाथों से बच्चे को पकड़के किसी तरह मुझे नमस्कार करने की कोशिश करके मेरे प्रति आभार प्रकट कर रहा था। उसकी आंखों में खुशी के आंसू थे। उसके मुंह से कोई शब्द नहीं निकल रहा था। बच्चे की माँ बार बार मेरे पैरों पर गिर रही थी। मैंने उसे किसी तरह समझाया। वह अपने बड़े भाई के गले लगकर रोने लगी। दोनों रो रहे थे। चाचा की गोद में बच्चा खुश था।
इसी बिच वहां काफी लोग जमा हो गए। उन्होंने मेरे उस ‘बचाव कार्य’ को करीब से देखा था। मधू ने मुझे कसकर गले लगा लिया। लोग मेरे कंधे थपथपा रहे थे, हाथ मिला रहे थे और शाबाशी दे रहे थे। हमने सभी को धन्यवाद दिया और घर की ओर निकल पड़े।
काफी देर तक पानी में रहने के कारण पैर जम गए थे । पुरे बदन में सिरहन हो रही थी। पैर ठीक से नहीं पड़ रहे थे। चलते समय बच्चे की माँ मुझसे कह रही थी , “भगवान ही तुम्हारे रूप में मदद करने आये। वरना इतने सारे लोगों के होते हुए एक भी हमारी मदद को नहीं आया, सच..!”
हम सब घर पहुँच गये। हमारी आवाज़ सुनकर सभी लोग बाहर आ गये। बच्चे की दादी ने दौड़कर उसे अपनी गोद में ले लिया। वह औरत अपनी माँ से लिपटकर रो रही थी। कह रही थी कि अगर मैं मदद के लिए नहीं आता तो वे बच नहीं पाते।
मेरी माँ बच्चे के लिए दूध लेकर आई और सबके लिए उसने चाय बनाई। मैं गर्म चाय के घूँट लेते हुए सबकी बधाइयां स्वीकार कर रहा था। उनकी नज़र में मैं ‘हीरो’ बन गया था । जब उन्हें मालूम पड़ा कि मुझे तैरना न आने के बावजूद भी मैंने उनके परिवार के लिए बाढ़ के पानी का सामना किया, और उनके परिवार के सदस्य को बचाया तो उनकी नज़रे बड़े प्यार से मुझे देखने लगी।
“वास्तव में, भगवान आज तेरे रूप में हमारी सहायता के लिए आए हैं। हम आपके उपकार को जीवन भर नहीं भूलेंगे” हर कोई मुझसे कह रहा था। मेरे माता-पिता मुझे गर्व से देख रहे थे।
