अल्केमिस्ट

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कॉलेज का दूसरा वर्ष शुरू हो चुका था। पहले ही दिन पता चला कि रविंद्र ने हमारा कॉलेज छोड़कर कहीं और प्रवेश ले लिया था। परिणाम वाले दिन, जब मैं ‘फर्स्ट क्लास फर्स्ट’ आया था, तब उसे दोस्तों के कंधों से उतरना पड़ा था। शायद वही बात उसके मन को भीतर तक चुभ गई थी।

कॉलेज में मेरे कई दोस्त बन गए थे। उन्हें दोस्त कहने के बजाय सहकर्मी कहना ज़्यादा सही होगा। क्योंकि बाद में उनमें से कई मेरे साथ रिश्तों में टेढ़े हो गए ।

अन्ना हमेशा मुझसे कहते थे,

“कभी भी बहुत ज़्यादा दोस्त मत बनाओ। जिसके बहुत सारे दोस्त होते हैं, उसका  कोई दोस्त नहीं होता  और जिसका सिर्फ़ एक दोस्त होता है, वही उसका सच्चा दोस्त होता है। तुम्हारे दोस्त ही तुम्हें बना या बिगाड़ सकते हैं।”

अन्ना सही कह रहे थे । मैंने पिछले कुछ वर्षों में इसे बहुत गहराई से महसूस किया था, और इसीलिए मैं दोस्तों के मामले में बहुत ‘चुनिंदा’ था।

अब कक्षा में सब विद्यार्थी  मुझे एक अलग नज़र से देखने लगे थे। लेकिन मैं पहले जैसा था वैसा ही था, पैरों में पैरागॉन की चप्पलें, पुरानी पैंट और शरीर पर सिर्फ एक नया शर्ट।

कॉलेज की विभिन्न असोसिएशनों की बैठकों का दौर शुरू हो चुका था। पूरे वर्ष में कौन-कौन से कार्यक्रम आयोजित किए जाएँ, कौन-सी नई प्रतियोगिताएँ रखी जाएँ, इन सबकी योजनाएँ बन रही थीं।

लेकिन हिंदी असोसिएशन की बैठक अभी तक नहीं हुई थी। रविंद्र के जाने के बाद उसे आगे बढ़ाने वाला कोई नहीं था। एक दिन कक्षा समाप्त होने के बाद हिंदी की प्राध्यापिका ने मुझे रोककर पूछा,

“क्या तुम मेरे असोसिएशन का काम संभालोगे?”

मैंने थोड़े झिझकते स्वर में कहा,

“मैडम, इसमें बहुत समय जाएगा। हो सकता है, पढ़ाई के लिए उतना समय न दे पाऊँ।”

उन्होंने मुस्कुराकर कहा,

“अरे, तुमसे कौन कह रहा है कि दिनभर असोसिएशन का काम करो? हफ्ते-दो हफ्ते में बैठकर प्लानिंग करनी है, नोटिस बोर्ड पर सूचना लगानी है। प्रतियोगिताओं के बाद हेड्स की मीटिंग बुलानी है और जिनके नाम चुने जाएँ, उन्हें नोटिस बोर्ड पर लिखना है… बस इतना ही!”

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मैंने फिर संकोच से कहा,

“लेकिन वो…?”

उन्होंने हँसते हुए मेरी बात बीच में ही काट दी,

“अरे, क्या तुम भी! इतना भी नहीं कर पाओगे? मैं तुम्हें सब समझा दूँगी… अब तो ठीक है?”

मैं कुछ कह पाता, उससे पहले ही वे बोलीं,

“और वैसे भी, तुम्हारे जैसे ज़िम्मेदार लड़के पर ही यह काम अच्छा लगेगा।”

उनके उस ‘जिम्मेदार’ शब्द को सुनकर मुझे मेरे सर पर किसीने कुछ भरी सामान रखा दिया हो ऐसा लगने लगा।

मुझे मालूम नहीं था की मैं कितना ‘जिम्मेदार’ था, लेकिन मुझे ‘जिम्मेदार’ बताकर एक ‘जिम्मेदारी’ मुझे दी जा रही थी।

सच कहूँ तो, मुझे ऐसी गतिविधियों में कोई विशेष रुचि नहीं थी। मेरी दुनिया सिर्फ पढ़ाई, जिम, क्रिकेट और अपने तक सीमित जीवन तक ही सिमटी हुई थी। लेकिन कक्षा में प्रथम आने के बाद लोगों की नज़रें बदल गई थीं। कुछ की आँखों में प्रशंसा थी, कुछ की आँखों में दूरी… और कुछ की आँखों में प्रतिस्पर्धा।

अब उन्हें मना करना संभव नहीं था। मैंने थोड़ा सोचकर कहा,

“ठीक है मैडम, मैं कोशिश करूँगा।”

और इस तरह, थोड़ी अनिच्छा के साथ, मैंने हिंदी असोसिएशन की ज़िम्मेदारी स्वीकार कर ली।

हमने हिंदी एसोसिएशन की बैठकें आयोजित करना शुरू कर दिया। कविता, कहानी, निबंध, वाद-विवाद, एक के बाद एक प्रतियोगिताओं की रूपरेखा बनने लगी।

मैडम हर बार मेरी राय पूछतीं। शुरुआत में मैं केवल “ठीक है” या “जैसा आप कहें” इतना ही बोलता था, लेकिन धीरे-धीरे मेरा संकोच कम होने लगा। मन में एक नई अनुभूति जन्म ले रही थी। कल तक, जिस पर किसी का विशेष ध्यान नहीं जाता था, वही आज असोसिएशन के प्रतिनिधि के रूप में सबके सामने खड़ा था।

उन्हीं दिनों मुझे पहली बार महसूस हुआ कि इंसान सिर्फ किताबों से बड़ा नहीं बनता; ज़िम्मेदारियाँ भी उसे गढ़ती हैं।

मैंने हिंदी असोसिएशन की पहली प्रतियोगिता आयोजित की, वह एक निबंध प्रतियोगिता थी। प्रचार के लिए मैंने कॉलेज की दोनों इमारतों के सभी नोटिस बोर्डों पर विज्ञापन लगाए। प्रतियोगिता को जबरदस्त प्रतिसाद मिला। बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने उसमें भाग लिया। मैंने स्वयं भी उस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और मुझे तीसरा पुरस्कार प्राप्त हुआ।

कॉलेज के प्रथम वर्ष में प्रवेश लेते समय, जीवन में घटी अनेक घटनाओं के कारण, मैं बहुत अंतर्मुखी हो गया था। क्रिकेट और वेटलिफ्टिंग के अलावा, मैं किसी भी प्रतियोगिता में भाग नहीं लेता था। हमेशा पीछे रहने की कोशिश करता था।

लेकिन हिंदी की प्राध्यापिका ने मेरी इस स्थिति को पहचान लिया था। वे मुझे लगातार विभिन्न प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए प्रेरित करने लगीं। वे मेरे भीतर के संकोच और नकारात्मक दृष्टिकोण को तोड़ना चाहती थीं। साथ ही, मेरे नेतृत्व गुणों का विकास हो, इसलिए उन्होंने जानबूझकर हिंदी असोसिएशन की ज़िम्मेदारी मुझे सौंपी थी।

वे केवल मुझे ही नहीं, बल्कि प्रत्येक विद्यार्थी को प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करती थीं। वास्तव में, हर शिक्षक का यह कर्तव्य होता है कि वह विद्यार्थियों के गुणों को पहचानकर उनके सर्वांगीण व्यक्तित्व-विकास के लिए उनका मार्गदर्शन करे।

एक दिन उन्होंने मुझसे कहा,

“तुम हर प्रतियोगिता में भाग लिया करो। इस साल, मैं एक अलग धनंजय को देखना चाहती हूँ।”

उनके शब्द मेरे भीतर कहीं गहराई तक उतर गए।

फिर मैंने स्वयं को पूरी तरह व्यस्त कर लिया। पढ़ाई, क्रिकेट की प्रैक्टिस, जिम, वेटलिफ्टिंग, पावरलिफ्टिंग और असोसिएशन के कार्यक्रमों के आयोजन… मैं हर काम में पूरी मेहनत से जुट गया। धीरे-धीरे मुझे महसूस होने लगा कि जीवन केवल स्वयं तक सीमित रहने का नाम नहीं है; दूसरों के बीच खड़े होकर ज़िम्मेदारी निभाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

इन सबमें मेरा काफी समय जाने लगा। कॉलेज सुबह सात बजे शुरू होकर साढ़े दस बजे तक समाप्त हो जाता था। क्रिकेट की प्रैक्टिस कॉलेज के बाद होती थी, इसलिए मुझे घर लौटते-लौटते दोपहर हो जाती थी।

घर आकर मैं तीन-चार घंटे पढ़ाई करता था और फिर शाम को जिम चला जाता था। जिम में दो घंटे व्यायाम करके घर लौटते-लौटते रात के आठ बज जाते थे। उसके बाद भी मैं रात बारह बजे तक पढ़ाई करता था।

जैसा कि मैंने पहले बताया, कॉलेज में कई विद्यार्थियों ने केवल डिग्री प्राप्त करने के लिए ‘आर्ट्स’ विषय चुना था। इसलिए परीक्षा नज़दीक आने पर ही उनके हाथों में किताबें और नोट्स दिखाई देते थे। लेकिन मैंने पहले ही दिन से पढ़ाई के लिए प्रतिदिन पाँच घंटे निश्चित कर दिए थे। जैसे कोई इंजीनियरिंग या मैनेजमेंट का विद्यार्थी गंभीरता से पढ़ाई करता है, उसी गंभीरता से मैंने बी.ए. की पढ़ाई शुरू की थी।

कॉलेज में प्रवेश मिलना मेरे लिए मानो ईश्वर का दिया हुआ एक अमूल्य उपहार था; इसी भावना के साथ मैं अपनी पढाई कर रहा था।

कॉलेज नियमित रूप से शुरू हो चुका था। कांबळे सर जब-जब मेरे सामने आते, तब-तब वे मुझे गुस्से से देखे बिना आगे नहीं बढ़ते थे। अब उन्हें रोज़ अपने सारे लेक्चर लेने पड़ते थे। ऊपर से, मैंने पहले वर्ष में उनका विषय छोड़कर हिंदी विषय लिया था और कॉलेज में ‘फर्स्ट क्लास फर्स्ट’ आया था। इसलिए यह बात उन्हें और भी चुभ रही थी।

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लेकिन उस दुःख से भी अधिक उन्हें इस बात का क्रोध और खेद था कि अब सुबह से सारे लेक्चर उन्हें ही लेने पड़ रहे थे और उसके लिए कहीं-न-कहीं मैं ज़िम्मेदार था।

एक बार मराठी एसोसिएशन ने ‘मराठी कथा प्रतियोगिता’ आयोजित की थी। मैं अपनी पढ़ाई और अन्य गतिविधियों में इतना व्यस्त था कि इस प्रतियोगिता की सूचना मैंने देखी ही नहीं थी। सच कहूँ तो, इस प्रतियोगिता का प्रचार भी ठीक से नहीं हुआ था।

कॉलेज पहुँचने के बाद मराठी एसोसिएशन की प्राध्यापिका ने मुझसे पूछा,

“तुम कथा-लेखन प्रतियोगिता में भाग ले रहे हो ना?”

मैंने कहा, “नहीं मैडम, प्रतियोगिता कब है?”

वे बोलीं, “अरे, प्रतियोगिता तो आज ही है और शुरू भी हो चुकी है। और तुम भाग क्यों नहीं ले रहे हो?”

मैंने उत्तर दिया, “मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि आज प्रतियोगिता है।”

उन्होंने कहा, “ठीक है, अंदर जाओ और प्रतियोगिता में भाग लो।”

मैंने थोड़े झिझकर कहा, “लेकिन मैंने कोई तैयारी नहीं की है।”

वे मुस्कुराकर बोलीं,

“उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जो भी सूझे, उसी पर कहानी लिखो।”

मैं ‘क्लास’ में गया। मराठी कथा प्रतियोगिता होने के कारण, हिंदी कथा और निबंध प्रतियोगिताओं की तुलना में अधिक विद्यार्थियों ने उसमें भाग लिया था। लगभग चालीस से पचास विद्यार्थी उस प्रतियोगिता में शामिल हुए थे। हर कोई कहानी लिखने में मग्न था।

प्रतियोगिता शुरू हुए काफी समय हो चुका था। मैंने परीक्षकों से कागज़ लिया और बेंच’ पर जाकर बैठ गया। क्या लिखूँ, यह समझ में नहीं आ रहा था। स्कूल के निबंधों के अलावा मैंने अब तक ऐसा कुछ भी नहीं लिखा था। दो दिन पहले ही हिंदी निबंध प्रतियोगिता हुई थी और उसमें मुझे तीसरा स्थान मिला था। बस, उसी से थोड़ा आत्मविश्वास आया था।

काफी सोच-विचार करने के बाद मैंने लिखना शुरू किया।

जब कहानी आधी ही हुई थी, तभी समय समाप्त हो गया। अधिकांश लोगों की लिखाई पूरी हो चुकी थी। मैंने और पंद्रह-बीस मिनट का समय माँगा। कहानी पूरी करके परीक्षकों को दी और बाहर निकल आया। उस प्रतियोगिता का परिणाम एक सप्ताह के भीतर आने वाला था।

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एक-दो दिन बाद मराठी की प्राध्यापिका ने मुझे बुलाया और कहा, “मुझे नहीं लगता कि यह कहानी तुमने लिखी है।” मैं थोड़ा आश्चर्यचकित होकर बोला, “मैडम, आपको ऐसा क्यों लगता है कि यह कहानी मैंने नहीं लिखी होगी?”

उन्होंने कहा,

“क्योंकि अब तक कॉलेज की प्रतियोगिताओं में मैंने ऐसी लिखी हुई कहानी नहीं पढ़ी है।”

मुझे कुछ समझ में नहीं आया। मैं चुपचाप वहीं खड़ा रहा। फिर उन्होंने पूछा,

“कहानी में जिन घटनाओं का तुमने वर्णन किया है, वे बहुत कल्पनाशील हैं। क्या तुम पढ़ाई के अलावा किताबें वगैरह भी पढ़ते हो?”

“जी हाँ, मैडम।”

“ठीक है, तुम जा सकते हो।”

दूसरे दिन प्रतियोगिता का परिणाम घोषित हुआ। कॉलेज पहुँचते ही सब लोग मुझे बधाई देने लगे। मेरा प्रथम स्थान आया था। मराठी असोसिएशन के सूचना फलक पर सबसे ऊपर मेरा नाम चमक रहा था।

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अण्णा को पढ़ने का बहुत शौक था। उन्होंने घर में पुस्तकों का मानो खजाना ही जमा कर रखा था। उसमें शेक्सपियर की रोमियो एंड जूलिएट, शेरलॉक होल्म्स की कहानियाँ, एडगर राइज बरोज की टारज़न की कथाएँ, बाबूराव अर्नाळकर की रहस्यकथाएँ, नारायण धारप की भयकथाएँ, जयंत नारलीकर की साइंस फिक्शन कथाएं,

तथा जिम कॉर्बेट और केनेथ एंडरसन की शिकार कथाएँ, ऐसे अनेक विषयों की अनगिनत किताबें थीं।

मुझे भी बचपन से पढ़ने का अत्यंत शौक था। स्कूल की छुट्टियाँ लगते ही अण्णा का नियम होता था कि हम बच्चों को उन सभी पुस्तकों को पढ़ना चाहिए।

मई की गर्मी की छुट्टियों में हम भाई-बहन और हमारे कुछ पुस्तक-प्रेमी मित्र-सहेलियाँ किताबें लेकर किसी गुलमोहर के पेड़ के नीचे बैठकर घंटों तक पढ़ने का आनंद लेते थे।

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एक-दो लोग पेड़ पर चढ़कर डालियों पर बैठ जाते और वहीं पुस्तक पढ़ते। हम सब अपने साथ इमली, कच्चे आम और तीखे नमक की पुड़िया लेकर जाते। फिर उन खट्टी इमलियों और कैरियों पर नमक लगाकर खाते हुए पुस्तक पढ़ने का आनंद लेते।

शेक्सपियर की भाषा प्रारंभिक आधुनिक अंग्रेज़ी में होने के कारण वह हमारे सिर के ऊपर से निकल जाती थी। इसलिए उन्हें छोड़कर बाकी सभी किताबें हम बड़े चाव से पढ़ डालते थे। छुट्टियों के दिनों में उन पुस्तकों पर कवर चढ़ाना, फटे हुए पन्नों को चिपकाना, लेखक के नाम के अनुसार उन्हें बड़ी लकड़ी की पेटी में सजाकर रखना, ऐसे काम अण्णा हमसे करवाते थे। इससे पुस्तकों के प्रति अपनापन बढ़ता गया।

एक-एक पुस्तक को दस बार पढ़ लेने पर भी मन नहीं भरता था। वे लेखक ही इतने अद्भुत थे।

हर लेखक की लिखने की अपनी अलग शैली होती है। वे अपने विचारों और कल्पनाशक्ति के माध्यम से कहानी और उपन्यास के प्रसंग रचते हैं। कुछ लोग केवल समय बिताने के लिए पढ़ते हैं, लेकिन वे लेखक द्वारा लिखे गए प्रसंगों और संवादों के साथ एकरूप नहीं हो पाते।

मेरे विचार से, पढ़ते समय लेखक द्वारा लिखे गए प्रसंगों के साथ स्वयं को जोड़कर उन्हें व्यक्तिगत रूप से अनुभव करना ही पढ़ने का वास्तविक आनंद है।

मराठी कहानी प्रतियोगिता में मैंने जो कहानी लिखी थी, वह एक लघु भयकथा थी। मैंने वह कहानी केवल एक घंटे में लिखी थी। स्वाभाविक रूप से, उसकी भाषा पर मेरे द्वारा पढ़ी गई अनेक भयकथाओं और अन्य कहानियों का प्रभाव था। लेकिन कहानी के प्रसंग और वर्णन पूरी तरह मेरी कल्पनाशक्ति पर आधारित थे।

विभिन्न लेखकों के साहित्य को पढ़ने के कारण मैं अपनी कहानी के विषय को कुछ अलग ढंग से प्रस्तुत करने में सफल हुआ था। अण्णा द्वारा लगाई गई पढ़ने की आदत का ही यह परिणाम था कि मेरी मराठी कहानी को प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार मिला।

कुछ दिनों बाद मैंने हिंदी एसोसिएशन की ओर से भी कहानी प्रतियोगिता आयोजित की। इस प्रतियोगिता को भी विद्यार्थियों का उत्साहपूर्ण प्रतिसाद मिला। स्वाभाविक रूप से, मैंने भी उसमें भाग लिया और इस प्रतियोगिता में भी मेरा प्रथम स्थान आया।

मराठी और हिंदी, दोनों एसोसिएशनों द्वारा आयोजित लगातार हुई कहानी प्रतियोगिताओं में मैंने प्रथम स्थान प्राप्त किया था।

कहानी प्रतियोगिताओं में मिली यह सफलता मेरे लिए केवल पुरस्कार जीतने तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह पढ़ने से मिली समृद्ध कल्पनाशक्ति का परिणाम थी।

विभिन्न लेखकों का साहित्य पढ़ते समय उनकी शैली, घटनाओं की प्रस्तुति, संवादों की शक्ति और वातावरण-निर्माण की कला धीरे-धीरे मेरे मन में बसती चली गई थी। इसलिए जब मैं कहानी लिखने बैठता, तो शब्द अपने आप सहज रूप से बहने लगते थे।

मराठी और हिंदी, दोनों कहानी प्रतियोगिताओं में प्रथम स्थान प्राप्त करने के कारण कॉलेज में मेरी एक अलग पहचान बन गई थी।

अण्णा ने हमें जो पढ़ने की आदत लगाई थी, वही मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूँजी साबित हुई। पुस्तकों ने मुझे केवल ज्ञान ही नहीं दिया, बल्कि सोचने का एक नया दृष्टिकोण भी दिया।

हर पुस्तक मेरे लिए एक नई दुनिया का द्वार खोलती चली गई। कभी रहस्यकथाओं से रोमांच का अनुभव हुआ, कभी भयकथाओं से वातावरण-निर्माण की शक्ति समझ में आई, तो कभी विज्ञान-कथाओं ने कल्पनाशक्ति को असीम उड़ान दी।

उन दिनों से मुझे एक बात गहराई से समझ में आने लगी, पढ़ना इंसान को केवल विद्वान ही नहीं बनाता, बल्कि उसके विचारों की दुनिया को भी विस्तृत करता है।

पुस्तकों से मिलने वाले अनुभव वास्तविक जीवन के अनुभवों जितने ही जीवंत होते हैं। और शायद इसी कारण, उन कहानी प्रतियोगिताओं में मिले पुरस्कार मेरे लिए केवल ट्रॉफियाँ नहीं थे; वे अण्णा द्वारा दिए गए पढ़ने के संस्कारों की सच्ची पहचान थे।

मेरे अन्य विषयों में ‘जियोग्राफी’ भी एक विषय था। आर. डी. पाटील सर यह विषय पढ़ाते थे। हमेशा मुस्कुराते रहने वाले ये सर बहुत ही मिलनसार स्वभाव के और आकर्षक व्यक्तित्व वाले थे। वे विद्यार्थियों के साथ मित्रों जैसा व्यवहार करते थे।

विद्यार्थियों में बहुत लोकप्रिय रहने वाले ये सर कॉलेज में एक अलग प्रकार की गतिविधि चलाते थे। हर वर्ष वे अपने ‘जियोग्राफी डिपार्टमेंट’ के विद्यार्थियों को खोपोली के पास किसी स्थान पर पिकनिक के लिए ले जाते थे। पिकनिक में आने वाले सभी विद्यार्थियों को मिलकर योगदान देकर खर्च उठाना होता था।

यह पिकनिक वे किसी सुंदर प्राकृतिक स्थान पर, विशेष रूप से नदी किनारे या डैम के पास आयोजित करते थे।सुबह बहुत जल्दी उठकर हम सभी विद्यार्थी लगभग छह–सात बजे एस.टी. स्टैंड पर इकट्ठा होते थे। उसके बाद पिकनिक स्थल की ओर जाने वाली पहली बस पकड़कर हम लगभग नौ–दस बजे तक वहाँ पहुँच जाते थे।

पिकनिक स्थल पर पहुँचने के बाद विद्यार्थी ही, विशेषकर लड़कियाँ, खाने की तैयारी करती थीं। कुछ विद्यार्थी जलाने के लिए लकड़ियाँ इकट्ठा करते थे, कुछ लोग पास के बाज़ार से खाना बनाने का आवश्यक सामान लाते थे, तो कुछ लोग पेड़ों के पत्तों की पत्तल बनाकर उन्हें साफ करके लाने का काम करते थे।

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खाना बनाने के बर्तन सर स्वयं लेकर आते थे। खाना तैयार होने के बाद सभी लोग पेड़ के नीचे पंगत लगाकर बैठते, बातें करते और धुएँ की खुशबू वाले उस भोजन का आनंद लेते थे।

भोजन के बाद थोड़ी देर विश्राम करके सर हमें कुछ ‘टीम बॉन्डिंग’ गतिविधियाँ करवाते थे। पूरा दिन हँसी-मज़ाक और आनंद में बीत जाता था। शाम को सभी विद्यार्थियों को खोपोली जाने वाली एस.टी. बस में बैठाने के बाद ही सर अपने घर जाते थे।

हर वर्ष ‘जियोग्राफी डिपार्टमेंट’ के विद्यार्थी इस पिकनिक के दिन का बेसब्री से इंतज़ार करते थे।

एक बार ‘जियोग्राफी’ का लेक्चर चल रहा था। पाटील सर पृथ्वी के वातावरण से संबंधित एक विषय पढ़ा रहे थे। सर विद्यार्थियों से बोले,

“मैं तुम लोगों से एक सामान्य प्रश्न पूछता हूँ। देखते हैं, तुम्हारा सामान्य ज्ञान कितना है?”

“ठीक है सर, पूछिए!” कुछ विद्यार्थियों ने कहा।

“पृथ्वी के ओज़ोन गैस के स्तर में जो छेद हो गया है, वह किस कारण से हुआ है?”

यह प्रश्न सुनकर सभी विद्यार्थी उलझन में पड़ गए, क्योंकि ‘ओज़ोन गैस’ का कोई उल्लेख जियोग्राफी के पाठ्यक्रम में नहीं था।

एक विद्यार्थी ने पूछा,

“सर, यह ओज़ोन गैस क्या होती है?”

सर बोले,

“ओज़ोन गैस की यह परत पृथ्वी के वातावरण के सबसे ऊपरी भाग में होती है। इस ओज़ोन परत में छेद हो जाने के कारण सूर्य की हानिकारक अल्ट्रावायलेट किरणें पृथ्वी तक पहुँचती हैं। यह ओज़ोन परत इन हानिकारक किरणों को पृथ्वी तक आने से रोकती है। अब जब इसी परत में छेद हो गया है, तो उसका कारण क्या हो सकता है?”

सभी विद्यार्थी इस विषय के बारे में अनजान थे। इसलिए वे आपस में धीरे-धीरे बातें करने लगे।

एक विद्यार्थी ने अपना ज्ञान दिखाते हुए उत्तर दिया,

“सर, शायद कोई हवाई जहाज़ बहुत ऊपर उड़ते हुए उस परत के बीच से निकल गया होगा, इसलिए उसमें छेद हो गया होगा।”

पूरा वर्ग ज़ोर से हँस पड़ा। सर भी हँसने लगे।

दूसरा विद्यार्थी थोड़ा और सोचकर, विज्ञान का सहारा लेते हुए बोला,

“सर, अमेरिका और दूसरे देश लगातार अंतरिक्ष में उपग्रह भेजते रहते हैं। उन्हें अंतरिक्ष तक ले जाने का काम बहुत बड़े अग्निबाण या रॉकेट करते हैं। उनके बार-बार जाने और उनसे निकलने वाले अत्यधिक गर्म धुएँ के कारण ही शायद ओज़ोन गैस की परत में यह छेद हो गया होगा?”

उस विद्यार्थी के उत्तर में कुछ तथ्य हो सकता है और उसका उत्तर सही हो सकता है, ऐसा सभी को लगा। अब सब लोग इस बात की प्रतीक्षा करने लगे कि सर इस उत्तर पर क्या कहते हैं।

सर बोले,

“यह तुमने कहाँ पढ़ा है?”

“मैंने कहीं नहीं पढ़ा, लेकिन मुझे ऐसा लगता है।”

सर बोले,

“किसी प्रश्न के सही उत्तर के लिए प्रमाण होना ज़रूरी होता है। तुम्हारा उत्तर बिल्कुल गलत है।”

सभी विद्यार्थी फिर एक-दूसरे की ओर देखने लगे। अब सर ने यह बड़ा चुनौतीपूर्ण प्रश्न पूरी कक्षा के सामने रख दिया था।

काफी देर तक कोई भी जवाब देने के लिए खड़ा नहीं हुआ, इसलिए जब मैं जवाब देने के लिए खड़ा हुआ

होने ही वाला था कि सर बोले,

“ठीक है, मैं बताता हूँ। ओज़ोन की इस परत में रासायनिक कारखानों से लगातार निकलने वाली गैसों के कारण छेद हुआ है।”

किसी ने सर से पूछा,

“कौन-सी गैसें, सर?”

सर बोले,

“विशेष रूप से कार्बन मोनोऑक्साइड गैस के कारण पृथ्वी की ओज़ोन परत में यह छेद हुआ है।”

ओज़ोन गैस के बारे में सर की कुछ जानकारी सही थी, लेकिन वह पूरी तरह अद्यतन नहीं थी।

अब मैंने हाथ उठाया। सर मुझसे बोले,

“हाँ धनंजय, बोलो…”

मैं खड़ा होकर बोला,

“सर, पृथ्वी की ओज़ोन परत में छेद कार्बन मोनोऑक्साइड गैस के कारण नहीं, बल्कि ‘क्लोरोफ्लोरोकार्बन’ गैस के कारण हुआ है।” बस…!! पूरी कक्षा के सामने सर के उत्तर को चुनौती दे दी गई थी।

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क्षणभर के लिए पूरी कक्षा में गहरी शांति छा गई। फिर सभी विद्यार्थी आपस में फुसफुसाते हुए कभी मेरी ओर, तो कभी सर की ओर देखने लगे।

कक्षा के विद्यार्थियों को पहले ही ‘ओज़ोन गैस’ के बारे में कुछ पता नहीं था, और अब मैंने ‘क्लोरोफ्लोरोकार्बन’ नाम की गैस का उल्लेख करके पूरी कक्षा को और भी उलझन में डाल दिया था। यह विषय अब उनके सिर के ऊपर से जा रहा था। सभी लोग अब दर्शकों की तरह हम दोनों को देखने लगे थे।

पाटील सर मुस्कुराते हुए मुझसे बोले,

“अरे धनंजय, तुम्हें यह किसने बताया? और यह कौन-सी नई गैस तुमने खोज निकाली है? कहाँ पढ़ा तुमने यह?”

उस समय मैं प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए समसामयिक घटनाओं पर आधारित Frontline नाम की एक प्रसिद्ध अंग्रेज़ी पत्रिका हर महीने पढ़ा करता था। उसी महीने के अंक में ‘ओज़ोन परत में छेद’ पर एक विस्तृत लेख प्रकाशित हुआ था, जिसे मैंने पढ़ा था।

संयोग से उसी विषय पर सर ने प्रश्न पूछ लिया था।

मैंने कहा,

“सर, ‘फ्रंटलाइन’ मैगज़ीन में इस विषय पर लेख आया है और उसमें इस गैस के बारे में बताया गया है। यह गैस ‘रेफ्रिजरेशन’ प्रक्रिया के कारण वातावरण में छोड़ी जाती है।”

कक्षा में फिर फुसफुसाहट शुरू हो गई। क्लोरोफ्लोरोकार्बन क्या, फ्रंटलाइन मैगज़ीन क्या, रेफ्रिजरेशन क्या, यह सब विद्यार्थियों के लिए बिल्कुल नया था। सभी लोग मेरी और सर की ओर देखने लगे।

सर ने कहा था कि “रासायनिक कारखानों से निकलने वाली गैसों के कारण यह छेद हुआ है,” लेकिन मैंने यह नया तथ्य सामने रखा था कि यह गैस ‘रेफ्रिजरेशन’, यानी शीतकरण प्रक्रिया, के कारण वातावरण में छोड़ी जाती है। इससे सर भी कुछ उलझन में पड़ गए।

जब सर को यह महसूस हुआ कि पूरी कक्षा उनकी ओर देख रही है, तो वे मुझसे बोले,

“यह कौन-सी मैगज़ीन है?”

“सर, ‘करंट अफेयर्स’ पर यह नया मासिक शुरू हुआ है।”

इतने में पीरियड खत्म होने की घंटी बज गई। जाते-जाते सर बोले,

“ठीक है। कल वह मैगज़ीन लेकर आना। देखते हैं ज़रा उसमें क्या लिखा है?”

बाकी विद्यार्थी मेरी ओर ऐसे देखने लगे, मानो कह रहे हों, “यह भी न, हर बार कुछ नया खोजकर ले आता है।”

दूसरे दिन मैं वह मैगज़ीन लेकर गया। कक्षा में आते ही सर ने पूछा,

“तो,क्या तुम वह मैगज़ीन लाए हो?”

कुल मिलाकर, ऐसा प्रतीत हुआ कि सर भी कल मैंने जो कहा था उसके बारे में जानने के लिए बहुत उत्सुक थे।

“हाँ सर, यह देखिए,” ऐसा कहकर मैं उनकी मेज़ के पास गया और मासिक में छपा वह लेख उन्हें दिखाया।

सर ने मैगज़ीन हाथ में लेकर उसके आगे-पीछे के पन्ने ध्यान से देखे। यह मासिक प्रसिद्ध समाचार पत्र समूह ‘द हिंदू’ प्रकाशित करता था।

सर ने वह लेख पढ़ा और मुझसे हाथ मिलाते हुए बोले,

“बहुत बढ़िया …!! तुमने खुद को वर्तमान घटनाओं से बहुत अच्छे तरीके से अपडेट रखा है।”

फिर उन्होंने मुझसे यह मासिक पढ़ने का कारण पूछा। मैंने उन्हें बताया कि मैं प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा हूँ और उसके लिए चालू घटनाओं पर आधारित यह मासिक बहुत उपयोगी है।

फिर कक्षा के विद्यार्थियों की ओर देखते हुए वे बोले,

“देखो, पढ़ाई करनी चाहिए तो ऐसी…!! केवल ‘सिलेबस’ के पीछे भागने से पढ़ाई नहीं होती; वह तो सिर्फ रटंत विद्या होती है। उस विषय से संबंधित अतिरिक्त पढ़ाई भी होनी चाहिए। तभी हमें पता चलता है कि उस विषय में क्या नई घटनाएँ हुई हैं, कौन-से नए शोध हुए हैं। जैसे अभी हमें यह पता चला। बहुत अच्छा धनंजय…! ‘कीप इट अप…!!’”

उस वर्ष मैंने हिंदी एसोसिएशन की सबसे अधिक प्रतियोगिताएँ आयोजित कीं और स्वयं भी उन सभी प्रतियोगिताओं में भाग लिया। साथ ही, अन्य एसोसिएशनों की प्रतियोगिताओं में भी मैंने हिस्सा लिया।

उनमें हिंदी एसोसिएशन की वाद-विवाद और कहानी प्रतियोगिता में मुझे प्रथम पुरस्कार मिला तथा ‘इम्प्रोम्प्टू’ भाषण और निबंध प्रतियोगिता में तृतीय स्थान प्राप्त हुआ। इसके अलावा, मराठी एसोसिएशन की कहानी प्रतियोगिता में प्रथम तथा इंग्लिश और जियोग्राफी एसोसिएशन की क्विज़ प्रतियोगिताओं में क्रमशः द्वितीय और तृतीय पुरस्कार प्राप्त हुए।

इन सभी अनुभवों से मुझे यह समझ में आया कि पढ़ाई, मेहनत, आत्मविश्वास और सही मार्गदर्शन का संगम ही सफलता की असली कुंजी है।

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कॉलेज के वार्षिक स्नेह सम्मेलन में मुझ पर पुरस्कारों की बरसात हो गई। सबसे अधिक पुरस्कार मैंने ही प्राप्त किए थे। प्राचार्य के हाथों पुरस्कार स्वीकार करते समय उन्होंने मेरी पीठ थपथपाते हुए कहा, “शाबाश धनंजय..!! तुमने हर क्षेत्र में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया है। ‘कीप इट अप…!!”

हिंदी एसोसिएशन की ओर से मुझे ‘बेस्ट ऑर्गनाइज़र’ का पुरस्कार मिला। एसोसिएशन की प्रतियोगिताओं के अलावा, मैंने विभिन्न खेल प्रतियोगिताओं में भी भाग लिया था।

मुंबई यूनिवर्सिटी की ‘वेट लिफ्टिंग’ प्रतियोगिता तथा कॉलेज की वार्षिक खेल प्रतियोगिताओं की ‘पावर लिफ्टिंग’ स्पर्धा में मुझे क्रमशः द्वितीय और तृतीय पुरस्कार प्राप्त हुए।

कॉलेज की क्रिकेट टीम से इस वर्ष भी मेरा चयन विश्वविद्यालय-स्तरीय प्रतियोगिता के लिए हुआ था। मैंने लगभग सभी प्रतियोगिताओं में भाग लेकर पुरस्कार प्राप्त किए थे। इनमें मुंबई विश्वविद्यालय स्तर पर आयोजित होने वाली दो प्रतियोगिताएँ भी शामिल थीं।

उस वर्ष मैंने विभिन्न प्रतियोगिताओं में कुल बारह पुरस्कार प्राप्त किए। साथ ही, कॉलेज की विविध खेल प्रतियोगिताओं, मुंबई विश्वविद्यालय की खेल स्पर्धाओं तथा अन्य एसोसिएशनों की प्रतियोगिताओं में भाग लेकर सबसे अधिक पुरस्कार प्राप्त करने वाला मैं कॉलेज का पहला विद्यार्थी बना था।

जब मैं वे सभी सर्टिफिकेट्स और ट्रॉफियाँ लेकर घर गया, तब आई और अण्णा बहुत खुश हुए। पिताजी की नियुक्ति खोपोली में महाराष्ट्र गव्हर्मेंट के फॉरेस्ट डिपार्टमेंट के ‘इंडो-जापनीज़ एग्रीकल्चर इंस्टिट्यूट’ में प्राचार्य के रूप में हुई थी।

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अगले दिन वे मेरी सभी सर्टिफिकेट्स और ट्रॉफियाँ अपने विद्यार्थियों को दिखाने के लिए साथ ले गए। उन्हें मुझ पर बहुत गर्व महसूस हो रहा था। उन्होंने मुझ पर जो विश्वास रखा था, उसे मैंने टूटने नहीं दिया था, बल्कि और अधिक मजबूत किया था।

कॉलेज के दूसरे वर्ष की वार्षिक परीक्षा निकट आ गई थी। रात देर तक जागकर मैंने फिर से पूरे जोश के साथ पढ़ाई शुरू कर दी। खेल, एसोसिएशन की प्रतियोगिताएँ और कार्यक्रम — इन सबके साथ-साथ मैंने अपनी पढ़ाई को भी सही ट्रैक पर बनाए रखा था। अब मैंने प्रत्येक विषय की रिवीजन शुरू कर दी।

परीक्षाएँ शुरू हुईं। उस वर्ष मेरे बहुमुखी प्रदर्शन के कारण सभी विषयों के प्राध्यापक और प्राध्यापिकाओं का ध्यान मेरी ओर आकर्षित हुआ था। सभी विषयों की परीक्षाएँ अच्छी गईं।

कुछ दिनों बाद परिणाम घोषित हुआ। उस वर्ष भी मैंने कला शाखा की वार्षिक परीक्षा में लगातार दूसरे वर्ष ‘फर्स्ट क्लास फर्स्ट’ स्थान प्राप्त किया।

एक वर्ष के भीतर मुझमें बहुत बड़ा परिवर्तन आ गया था। पहले मैं अंतर्मुखी और पीछे रहने वाला था, लेकिन अब मैं पूरी तरह बदल चुका था। पढ़ाई, जिम, खेल और प्रतियोगिताओं, हर क्षेत्र में मैंने स्वयं को आगे रखने का प्रयास किया था और उसमें सफल भी हुआ था।

कॉलेज के विद्यार्थियों और प्राध्यापक वर्ग में मेरी पहचान बनने लगी थी। मेरे भीतर एक अलग ही आत्मविश्वास पैदा हो गया था। इसका पूरा श्रेय हिंदी की प्राध्यापिका को जाता है।

उन्होंने मुझसे कहा था,

“इस साल से मैं एक अलग धनंजय को देखना चाहती हूँ।”

और वास्तव में ऐसा ही हुआ था। उन्होंने मुझे वक्तृत्व, कहानी-लेखन, निबंध-लेखन, वाद-विवाद आदि प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया था।

ये हिंदी की प्राध्यापिका अत्यंत प्रतिभाशाली थीं। वे उर्दू में लघुकथाएँ, कविताएँ, शायरी और कहानियाँ लिखा करती थीं। उन्होंने अब तक अपना यह लेखन कहीं प्रकाशित नहीं किया था। कभी-कभी वे अपनी कोई कहानी या कविता मुझे पढ़ने के लिए देतीं और मेरा अभिप्राय पूछतीं।

मैं उनका साहित्य पढ़कर समय-समय पर अपनी प्रतिक्रिया देता था। वे बहुत अच्छा लिखती थीं।

मैं उनसे कहा करता था,

“मैडम, आप अपना यह साहित्य प्रकाशित क्यों नहीं करवातीं?”

वे कहतीं,

“अरे, किसके पास इतना समय है ये सब करने के लिए…?”

जब वे ऐसा कहतीं, तब मैं उनसे कहा करता था,

“मैडम, एक दिन मैं आपका यह साहित्य ज़रूर प्रकाशित करवाऊँगा। आप एक दिन बहुत बड़ी साहित्यकार बनने वाली हैं।”

हालाँकि, मुझे उनका साहित्य प्रकाशित करने का अवसर कभी नहीं मिला।

कॉलेज से डिग्री लेने के बाद मैं पुणे आ गया और उसके बाद कई वर्षों तक उनसे मेरा संपर्क नहीं रहा। मेरे व्यक्तित्व में अंदर और बाहर से परिवर्तन लाने में उनका बहुत बड़ा योगदान था।

कुछ वर्षों बाद मैं दादर में ‘प्री-एम्प्लॉयमेंट मेडिकल टेस्ट’ के लिए गया हुआ था। वहीं फुटपाथ की भीड़ में संयोग से मेरी कॉलेज की एक सहपाठिनी मुलाक़ात हो गयी। उसी से मुझे मैडम का फोन नंबर मिला।

जब मेरी उनसे बातचीत हुई, तब उन्होंने बताया कि उन्हें University of Mumbai से पीएच.डी. प्राप्त हुई है। साथ ही, उनकी कुछ कविताएँ, कहानियाँ और शायरी भी प्रकाशित हो चुकी थीं। भारतीय उर्दू साहित्य जगत में उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनानी शुरू कर दी थी। यह सुनकर मुझे बहुत खुशी हुई।

हाल ही में भारत सरकार ने उन्हें भारतीय साहित्य में उनके महत्वपूर्ण योगदान को देखते हुए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया।

बातों ही बातों में मैंने उनसे कभी कहा था,

“आप एक दिन बहुत बड़ी साहित्यकार बनने वाली हैं।”

और सचमुच, अपनी मेहनत के बल पर उन्होंने वह स्थान प्राप्त कर लिया था। लेकिन मेरे जीवन में तो वे सच अर्थों में एक ‘किमयागार’, यानी ‘अल्केमिस्ट’, साबित हुई थीं।

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