मौत की रात | भाग – २

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पिताजी ने अविश्वास से उस आदमी की ओर देखा और कहा,

“अरे तो तुमने उसे बाहर कैसे नहीं निकाला?”

“सर, कोई भी मदद करने को तैयार नहीं है। घर आधा डूब गया है। केवल ऊपरी मंज़िल ही बची है। बाढ़ का पानी घर में घुस गया इसलिए हम घर से बाहर भागे। जब हम घर से दूर पहुंचे तो हमें पता चला कि हमारी छोटी बहन हमारे साथ नहीं है। जब हम घर से बाहर भागे तो वह अपने बच्चे के साथ ऊपर माड़ी पर सो रही थी।”

“ओह !, लेकिन तुम वापिस जाकर उसे ले आ सकते थे, है ना?”

“नहीं सर। घर के चारों ओर तुरंत गर्दन तक पानी भर गया। हमको वापिस जाने का मौका ही नहीं मिला। और मैं  और हममें से कोई भी उस घर में घुसने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा। सर, लडकी को और उसके बच्चे को बचाने में हमारी मदत किजीये।”

“अरे, लेकिन हम कैसे बचाएंगे ? क्या तुमने पुलिस को बताया?”

“सर, पुलिस का कोई पता नहीं है । दूसरे लोग सें भी हाथ पैर जोड़कर देख लिया लेकिन कोई भी मदद करने को तैयार नहीं है।”

वह परिवार गाँव में नया था। बड़ा बेटा डॉक्टर था। उन्होंने हाल ही में गांव में एक क्लिनिक शुरू किया था ।

इससे पहले कि बहस और बढ़ जाए, तभी मेरा सबसे अच्छा दोस्त मधु घर पर आया।  वह बाढ़ की सूचना देने आया था।  यह सब सुनकर वह भी असमंजस में पड़ गया।

पिताजी ने उससे कहा, “अरे मधू, मदद के लिए अपने गांव से किसी को ले आओ। लेकिन उस आदमी को तैरना आता है क्या ये देखो।”

मधु बोला , “अन्ना, कोई आने के लिए तैयार नहीं होगा। बाढ़ के पानी में कोई नहीं जाएगा।”

“सर, जल्दी कुछ करो नहीं तो लड़की पोते के साथ खत्म हो जाएगी।” परिवार का मुखिया बड़ी व्याकुलता से बिनती करने लगा।

“सर आप अपने बेटे को मदद के लिए भेज सकते है क्या ?”

“अरे, ये कैसे संभव है?” मैं उसकी जान जोखिम में कैसे डाल सकता हूँ..? तूम  अपनी बहन को बाढ़ के पानी में कैसे छोड़ आये ..?

पिताजी  कुछ चिढ़े गए थे । क्योंकि वह आदमी अपनी और अपने परिवार की जान बिना जोखिम में डाले दूसरों कि जान जोखिम में डाल रहा था ।

दरअसल मैंने अभी तक बड़ों की बातचीत में भाग नहीं लिया था लेकिन मधू की राय पूछने के बाद मैंने यह मानकर बात की कि मुझे भी बोलने का मौका मिला है।

“अन्ना, क्या मैं मधू के साथ जाऊं और देखूं कि क्या किया जा सकता है?”

मैं उस समय कॉलेज के प्रथम वर्ष में था। खेल और व्यायाम के नियमित रहने से मैं फुर्तीला था और ऊंचाई भी ठीकठाक थी ।  इसलिए शायद परिवार के मुखिया ने मेरे बारे में पूछा था । अन्त में पिताजी बोले,

“ठीक है, ध्यान रखना। मधू , बस इस पर नजर रखना।”

तभी  माँ ने कहा, “आप  उसे क्यों भेज रहे हो? अगर कुछ हो गया तो क्या होगा? वैसे भी, वह हमारा एकलौता है। किसी और को जाने के लिए कहो।”

मैंने माँ से कहा, ” माँ, मैं पानी में नहीं जाऊँगा। मैं देखूँगा कि उन्हें वहाँ कोई मदद मिलती है या नहीं। आप बिलकुल फिकर मत करो ।

बारिश की तीव्रता अब कुछ कम होती दिख रही थी। घर से बाहर आने के बाद मालूम हुआ कि बाहर बारिश ने कितना कहर बरपाया है। हालाँकि बाढ़ का पानी हमारे क्षेत्र तक नहीं पहुँचा था , लेकिन क्षति व्यापक थी । हवा से कुछ घरों के छप्पर उड़ गए थे। सड़कों और आँगन में नारियल के पेड़, पोपली के पेड़ और आम के पेड़ उखड़ कर गिर गए थे । हम सड़क पर गिरे हुए पेड़ों के बीच से रास्ता बनाके चल रहे थे।

कुछ देर बाद हम उस घर के पास पहुंच गये। घर एक मंजिल का था और आधा पानी में डूबा हुआ था। घर का अधिकांश भाग लकड़ी का बना हुआ था। घर के अगले हिस्से का प्रवेश द्वार खुला हुआ था। अंदर का मुख्य दरवाजा भी खुला हुआ था। घर के लोग दरवाजा खुला छोडके ही जान बचाकर भाग गए थे। ऐसा लग रहा था कि बाढ़ के पानी ने उन्हें उतना अवसर नहीं दिया था। उस जल्दबाजी में वे अपनी बहन को भूल गए थे जो ऊपरी मंज़िल पर सो रही थी। घर का अगला हिस्सा, जिसे स्थानिक भाषा में ‘ओसरी’ कहते है, लकड़ी की पट्टियों से बना हुआ था। और  उसी ‘ओसरी’ से ही  ऊपरी मंजिल तक जाने के लिए लकड़ी की सीढियाँ थी, जो बाढ़ के पानी में आधी डूबी हुई थी। और उस ऊपरी मंजिल पर एक महिला अपने बच्चे के साथ खड़ी होकर मदद की गुहार लगा रही थी।

इलाके के सभी घर आधे पानी में डूब गए थे। उस बस्ती के सामने सड़क पर साढ़े चार से पांच फीट पानी था। पानी का बहाव हल्का था और उसमे  कुछ घरेलू सामान बह के जा रहा था । पानी बहुत गंदा था ।  बाढ़ का पानी गांव की सारी गंदगी बहा ले आया था । पानी के किनारे कई लोग दूर खड़े होकर अपने घरों को देख रहे थे। उस बस्ती के घर में फंसा एकमात्र व्यक्ति उस परिवार के मुखिया की बहन और उसका बच्चा था ।

हमें देखकर वह महिला अपने भाई को बुलाने लगी ।

 “भैया, मुझे जल्दी बाहर निकालो। यह घर गिरने वाला है, मुझे जल्दी बाहर निकालो।”

घर से जहां हम खड़े थे वहां की दूरी लगभग सौ फीट थी और पूरा इलाका पानी से भरा हुआ था। घर के सामने की सड़क पूरी तरह जलमग्न हो गयी थी। सड़क के किनारे की सीवर और नालियां सब पानी में डूब जाने से यह अंदाजा लगाना नामुमकिन था कि सीवर, नाली कहां है और सड़क कहां है, और इसीलिए लोगों की हिम्मत नहीं हो रही थी  कि वे महिला की मदद के लिए जाएं।

तभी फिर से बारिश शुरू हो गई। ऐसी संभावना थी कि पानी फिर से बढ़ जाएगा और इस बात की कोई गारंटी नहीं थी कि वह महिला ऐसी स्थिति में कितनी देर तक वहां रुकी रहेगी।

पानी बढ़ रहा था। पानी के स्तर से करीब तीन फीट ऊपर घर के प्रवेश द्वार की ऊपरी बीम खुली थी। ऊपरी मंज़िल की ओर जाने वाली सीढि़यों का आधा हिस्सा उसी स्तर तक पानी में डूबा हुआ था।

हमने एक दो आदमियोंसे से पूछा कि क्या नावें उपलब्ध हैं ? लेकिन कोलीवाड़ा  में अधिकांश नावें बह गईं थी और बची हुई नावें कोलीवाड़ा में फंसे लोगों को निकालने में लगी हुई थीं। हमने भीड़ से यह पूछकर मदद लेने की भी कोशिश की कि क्या कोई तैराक आदमी  महिला और उसके बच्चे को बाहर निकालने में मदद करेगा ? लेकिन कोई भी पानी में जाने को तैयार नहीं था।

“अरे भाई , अब इस पानी में कौन उतरेगा ? हर किसी को अपनी जान प्यारी होती है या नहीं ?”

उन लोगों ने उसके भाई की ओर हाथ करके कहा. ” ये उसे और उसके बच्चे को छोड़कर अपनी जान बचाने के लिए भागा, अब वह खुद भी पानी में नहीं उतर रहा है। यानी कि अपनी जान बचाना है और दूसरों की जान जोखिम में डालना है। कैसा आदमी है यह ..!!”

हर कोई उस लड़की के भाई से नाराज था।

अब महिला का धैर्य टूटता नजर आ रहा था। वह रोना बंद नहीं कर रही थी और अब उसका बच्चा भी रोने लगा था। मधू और मैं इस बात से हैरान थे कि उस लड़की का बड़ा भाई लोगों से मदद की गुहार लगा रहा था लेकिन खुद पानी में नहीं उतर रहा था।

मैंने बहते पानी पर एक नजर डाली।  पानी अब तेजी से बह रहा था। उस धारा में बहुत सारी चीजें बह रही थी। इससे प्रवाह की गति का अनुमान लगाया जा सकता था । एक पल सोचने के बाद मैंने सभी की ओर एक बार देखा और मधू को बोला,

‘क्या मैं जाऊं?’

मधू ने कहा, “अरे,लेकिन तुम्हे तैरना कहा आता है ?” अगर कुछ हो गया तो..?”

मैंने उससे कहा, “देखते है क्या होता है ?”

मुझे शुरू से ही पानी से डर लगता था और शायद इसीलिए मैं तैराकी से दूर रहा। और अब यहाँ बाढ़ के पानी मैं उतरनेका यह धैर्य , जहाँ  सड़कें, नालियां, सीवर पानी में डूबे हुए हैं और पानी की गहराई का कोई अंदाज़ा नहीं है, मुझे पता नहीं मैं कहां से लेके आया था । पानी में उतरते समय मैंने प्रभु यीशु से प्रार्थना की और मदद मांगी।

अठारह-उन्नीस साल के मैने जब पानी में कदम रखा तो मेरे हाथ में सहारे के लिए कुछ भी नहीं था। सारे शरीर में ठंडक की एक सिहर दौड़ गयी । पानी की गहराई का अंदाजा न होने पर मैं धीरे-धीरे पैर लड़खड़ाते  हुए आगे बढ़ना शुरू कर दिया। मुझे  पानी में उतरते देखकर, उस महिला ने रोना बंद कर दिया था और बड़ी आशा से मेरी ओर देखने लगी।

बारिश तेज़ होने लगी थी। एक तरफ से आ रहा पानी मुझे धकेल रहा था। और मेरे लिए अपना संतुलन वापस पाना बहुत मुश्किल हो रहा था। एक हाथ से सिर से चेहरे तक पानी पोंछते हुए मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ा। दरअसल, मुझे अपने चलने की गति बढ़ानी चाहिए थी क्योंकि अगर पानी का स्तर और प्रवाह बढ़ जाता तो घर तक पहुंचने का रास्ता बंद हो जाता। लेकिन पानी के बहाव और जलमग्न सड़क की अनिश्चितता के कारण यह संभव नहीं था।

मैं अब धारा के बीच में पहुँच गया था। मैंने अपना ध्यान घर के प्रवेश द्वार पर केन्द्रित किया। अंदाज़ा लगाएं तो सड़क घर के सामने से गुजरती थी। मुझे ऐसा लगा की मैं सड़क के बीच में खड़ा हूं। लेकिन मुझे इस बात का अंदाज़ा नहीं था कि घर और सड़क के बीच कोई नाली या सीवर है। इधर पानी सिने तक आ गया था और चलने के लिए अगर मै पैर उठाता था तो शरीर एकदम हलका होकर संतुलन खो देता था।  मैं बहुत ही विकट परिस्थिति में खुद को संभालते हुए बहते पानी के बीच से आगे बढ़ रहा था। जलधारा में लकड़ी, बक्से और कई अन्य चीजें बही जा रही थीं। पानी के बहाव के कारण पैर जमीन से फिसल रहे थे।

ओसारी के दरवाजे तक पहुँचने में मुझे बिस से पच्चीस मिनट लगे होंगे। दरवाजे पर पानी सिने तक था। सामने पानी में डूबा हुआ घर का अगला कमरा दिखाई दे रहा था। टीवी, अलमारियाँ, बिस्तर, सब कुछ पानी में डूबा हुआ था।

दाईं ओर मुड़कर, मैंने आंशिक रूप से जलमग्न सीढ़ी पर चढ़ना शुरू किया और पहली पायदान पर ही मेरा पैर फिसल गया।

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