मौत की रात | भाग – 4

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वह परिवार कुछ दिनों तक हमारे घर पर रहा और बाढ़ कम होने के बाद अपने गाँव चला गया। बाढ़ ने गांव को तबाह कर दिया था। पूरा बाजार और आधा गांव दो-तीन दिनों तक पानी में डूबा रहा। कई परिचित डूब गये थे। अचानक घरों में पानी घुस जाने से कुछ लोग अपने घरों से बाहर नहीं निकल पाये। उन्होंने ऊपरी माले पर शरण लेने की कोशिश की थी। लेकिन बाढ़ इतनी भीषण थी कि गांव के आधे घर बाढ़ के पानी में डूब गए। परिणामस्वरूप, कई लोग घर के अंदर फंसकर मर गए क्योंकि पूरे घर में पानी भर गया था और वे ऊपरी माले से बाहर नहीं निकल सके। उनके शव वही पर पड़े मिलें। 

उस रात संपूर्ण कोंकण तट पर अभूतपूर्व और रिकॉर्ड तोड़ वर्षा हुई। 23 जुलाई की शाम आई ज्वार (भरती) के कारण पाली और नागोठणे क्षेत्र में बाढ़ की स्थिति और भी भयावह हो गई। इससे बैकवॉटर प्रभाव उत्पन्न हुआ और सावित्री नदी, गांधारी नदी तथा अंबा नदी जैसी नदियों का पानी समुद्र में स्वतंत्र रूप से नहीं जा सका।

अंबा नदी सबसे अधिक प्रभावित नदियों में से एक थी। यह खोपोली से निकलकर पाली, जांभुळपाडा, वाकण और नागोठणे होते हुए आगे पोयनाड और वडखळ से बहती हुई अंततः धरमतर खाड़ी में मिलती है। इस बीच, महाड के पास सावित्री नदी, गांधारी नदी, काल नदी और नागेश्वरी नदी का संगम होने से बड़ा अवरोध उत्पन्न हुआ। सह्याद्री पर्वतमाला से अत्यधिक वेग से नीचे उतरने वाला पानी लगभग एक ही समय में निचले इलाकों में पहुंच गया, जिससे स्थिति और गंभीर हो गई।

जब पानी का प्रचंड बहाव नदियों में उतरा, तो वह एक दीवार जैसी लहर बनकर पाली, जांभुळपाडा और वाकण की ओर बढ़ा। पाली गांव नदी से थोड़ा दूर होने के कारण वहां अपेक्षाकृत कम नुकसान हुआ। लेकिन जांभुळपाडा गांव पूरी तरह बाढ़ की चपेट में आ गया। आधी रात के समय आई जलधारा ने पूरे गांव को जलमग्न कर दिया और तबाह कर दिया। केवल किस्मत के सहारे बहुत कम लोग बच पाए। जांभुळपाडा गांव लगभग पूरी तरह नष्ट हो गया।

हमारे बगल में उसी गाँव के एक सेवानिवृत्त शिक्षक रहते थे। उन्होंने एक घर किराए पर लिया था क्योंकि उस गावं में उनके घर का नवीनीकरण का काम चल रहा था। जब उनके पोते-पोतियाँ छुट्टियों में घर आते थे, तो वे उन्हें नागोठना ले आते थे। क्योंकि जांभूलपाड़ा, में अधिकतर आदिवासी निवास करते थे। इसलिए उन बच्चों का दिल वहां लगता नहीं था।  बच्चों के माता-पिता नहीं थे। दादा-दादी उनकी देखभाल कर रहे थे। दुर्भाग्य से उस दिन बुजुर्ग दंपत्ति जांभूलपाड़ा स्थित अपने घर चले गए और फिर कभी दिखाई नहीं दिए।

नागोठाणे गांव से सटे मुंबई-गोवा एक्सप्रेस वे के दोनों ओर गाडियोंकी लंबी कतार लगी थी।  रात को वाकन में पुल के उपरसे  नदी का पानी बहने लगा था। बाढ़ के पानी की गरजती हुई दीवार इस पुल से टकरायी।  पानी तेजी से पुल के दोनों तरफ फैलने लगा। पानी की गति इतनी अधिक थी कि पुल के दोनों ओर खड़ी गाड़ियां पानी एक झटके में बह गयी । उसमेसे कोंकण से आने वाली और जाने वाली कईं एस.टी. बसेस थी।  बड़ी संख्या में जीवितहानि हुयी।  बाढ़ कम होने के बाद, कई वाहन नदी के तल में फंसे हुए पाए गए। अंदर फंसे शव पहचान से परे थे।

पूरा गाँव और आसपास का इलाका नष्ट हो गया था। अधिकांश लोग गाँव छोड़ चुके थे क्योंकि गाँव अब रहने लायक नहीं रहा था । सर्वत्र कीचड़, दुर्गन्ध, महामारी फैल गयी थी । गांव में बिजली आपूर्ति बहाल करने में एक महीना लग गया । 

दो दिन बाद हमारे चाचा मुम्बई से कार लेकर आए थे। जब वह आये तो ढेर सारा किराने का सामान, बिस्कुट, खीरे आदि लेकर आये। रास्ते में उनको खाने लायक जो कुछ भी मिला वो लेकर वह आये थे।  हाईवे पर कई जगहों पर पानी भरा हुआ  था। उनके लिए नागोठना  तक पहुंचना बहुत कठिन था। उनकी मदद हम सभी के लिए बहुत उपयोगी हुयी थी ।

हमने भी उस गांव को छोड़ने का फैसला कर लिया। पिताजी ने अपने परिचित के यहां किराये से टेंपो मंगवाया। हमने घर का सारा सामान लेकर गांव छोड़ दिया और खोपोली चले आए। वहाँ पिताजी को बहुत विशाल सरकारी बंगला मिला हुआ था।

नागोठणे गांव को पुनर्वासित होने में दो साल लग गए। गाँव को नए से बसाया गया। जो परिवार हमारे घर आया था , वह दोबारा कभी नहीं मिला और न ही उस परिवार ने दुबारा हमसे मिलने की कोशिश की।  

उस गांव में हर किसी के जीवन में एक नया मोड़ आ गया था। तैरना न आने के बावजूद भी बाढ़ के पानी में मैंने  बच्चा और उसकी माँ को बचाने का जो धाडस किया था, वह सब अप्रत्याशित था। परिणाम की परवाह किये बिना समय पर लिया गया मेरा निर्णय एक परिवार को संकट से बाहर निकालने का कारण बना था । उन सब घटनाओं से गुज़रते हुए मुझमें भी कुछ बदलाव आया। मैंने प्रकृति के इस भयानक रूप को बहुत करीब से देखा था। यह एहसास हुआ कि प्रकृति की तुलना में मानव जीवन कितना नगण्य है। मेरा व्यक्तित्व कुछ अंतर्मुखी हुआ था। 

इस बाढ़ के कारण मेरे कॉलेज का एक साल बर्बाद हो गया। मैंने खोपोली में नए से कॉलेज में प्रवेश ले लिया। मैंने सब कुछ भूलकर अपने कॉलेज जीवन की फिरसे शुरुआत की।

लेकिन उसके बाद कुछ रातों तक …वह नदी मेरे सपनों में बह रही थी।

 

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