हम खोपोली में रहने आए। खोपोली मुंबई-पुणे राजमार्ग पर स्थित एक महत्वपूर्ण शहर था। औद्योगिक रूप से विकसित इस शहर में बड़े बड़े कारखाने, कॉलेज, एक इंजीनियरिंग कॉलेज और एक पॉलिटेक्निक जैसे संस्थान थे। यह मुंबई और पुणे को जोड़ने वाले बोरघाट या खंडाला घाट के आरंभ में तथा सह्याद्री पर्वत श्रृंखला की तलहटी में स्थित था।
उस समय यह महाराष्ट्र का एकमात्र ऐसा शहर था जहाँ इसकी नगरपालिका की अपनी बस परिवहन व्यवस्था थी। औद्योगीकरण के कारण शहर में फैले भारी प्रदूषण की वजह से, प्रकृति से भरपूर और प्रदूषण-रहित नागोठणे जैसे गाँव से आए हम लोगों को इस शहर के वातावरण में ढलने में काफी समय लगा।
इसी बीच मैंने एक वरिष्ठ कॉलेज में दाखिला लेने की कोशिश की। मेरे मन में कई सपने थे। एक नई शुरुआत की उम्मीद और भविष्य के प्रति आशावाद। लेकिन शैक्षणिक वर्ष के बीच में होने के कारण मुझे प्रवेश नहीं मिला। उस पल मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करूँ। पूरा एक साल बर्बाद हो जाने का डर मेरे मन में घर कर गया। वह डर सिर्फ़ कल्पना नहीं था; उसके पीछे एक वजह छिपी थी।
फ्लैशबैक…
स्कूल और कॉलेज के दिनों में क्रिकेट मेरा असली जुनून था। जब मैं नौवीं कक्षा में था, तब नागोठणे गाँव के वरिष्ठ खिलाड़ियों के ‘जॉली क्रिकेट क्लब’ के लिए खेलने वाला मैं सबसे कम उम्र का खिलाड़ी था। जिला स्तरीय प्रतियोगिताओं में मैं नंबर एक पर बल्लेबाजी करता था।
लेकिन मैं सिर्फ खेल में ही आगे नहीं था; पढ़ाई में भी मैंने उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। मैंने दसवीं कक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की थी और कुल मिलाकर दूसरा स्थान प्राप्त किया था। ‘प्रिलिम’ परीक्षा में मैंने अंग्रेजी में सौ में से नब्बे अंक प्राप्त किए थे, जो कई वर्षों तक एक रिकॉर्ड बना रहा। मैंने स्कूल में लगातार दो वर्षों तक “आदर्श छात्र” पुरस्कार जीता था; जो उस छात्र को दिया जाता था जो पढ़ाई, खेल और पाठ्येतर गतिविधियों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करता हो।
जब मैं ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा में था, तब मैंने पेण में वाणिज्य शाखा में दाखिला लिया था। मैं हर दिन कॉलेज जाने के लिए नागोठणे से पेण तक एस.टी. बस से जाता था। यह दूरी लगभग सत्तर किलोमीटर की थी और पेण पहुँचने में करीब एक से डेढ़ घंटा लगता था।
तब क्रिकेट में मेरी प्रतिभा और निखरने लगी। जाहिर है, मेरी पढ़ाई पर ध्यान कम होने लगा। ज़िले भर में मैच खेलने जाना, दोस्तों का साथ और मैदान में मिलने वाली तालियाँ, ये सब धीरे-धीरे मेरी पढ़ाई के आड़े आने लगे।अण्णा काम के सिलसिले में हफ्ते में पाँच दिन खोपोली में रहते थे, इसलिए मुझे काफी आज़ादी मिल जाती थी।
बारहवीं कक्षा में पूरी क्लास में से सिर्फ नौ छात्र पास हुए। सौभाग्य से मैं उन नौ में से एक था, लेकिन अंदर ही अंदर मुझे महसूस होता था कि यह नतीजा मेरी काबिलियत के अनुरूप नहीं था।
स्नातक होने के बाद मैं पुलिस इंस्पेक्टर (पी.एस.आई.) बनना चाहता था। अगर मुझे उस दिशा में आगे बढ़ना था तो कला शाखा मेरे लिए सही विकल्प थी। लेकिन उस समय कला शाखा को अक्सर टाइमपास माना जाता था। एक ऐसा डिग्री कोर्स जिसमें रोजगार की कोई गारंटी नहीं होती थी। इसलिए मुझे अपनी इच्छा के विरुद्ध वाणिज्य शाखा में दाखिला लेना पड़ा। लेखा और बहीखाता जैसे विषय मेरे लिए कठिन थे। संख्याओं की उस दुनिया में मेरा मन कभी नहीं लगा।
पढ़ाई में अच्छा होने के बावजूद, क्रिकेट के प्रति दीवानगी के कारण मैं पढ़ाई से थोड़ा भटक गया था। स्कूल में लगातार दो वर्षों तक ‘आदर्श विद्यार्थी’ के रूप में ख्याति अर्जित करने के बावजूद अब शिक्षा के क्षेत्र में मेरी असफलता के संकेत दिखाई देने लगे थे।
बारहवीं पास करने के बाद मैंने वाणिज्य शाखा के प्रथम वर्ष में दाखिला लिया। वहाँ भी मेरी प्रगति धीमी रही। क्रिकेट मुझसे छूट नहीं रहा था। मैं अक्सर कॉलेज से अनुपस्थित रहकर जिला स्तरीय प्रतियोगिताओं में खेलने के लिए अलग-अलग जगहों पर चला जाता था। कॉलेज के पहले साल में किसी तरह पास होने के बावजूद मेरे प्रदर्शन में कोई सुधार नहीं हुआ। अण्णा ने तो मुझसे कुछ भी होने की उम्मीद लगभग छोड़ दी थी।
इसी दौरान अख़बार में एक विज्ञापन पर उनकी नज़र पड़ी, “दूध उत्पादन प्रबंधन” का एक कोर्स। यह कोर्स बारहवीं पास छात्रों के लिए था। अण्णा को लगता था कि मैं वाणिज्य में सफल नहीं हो पाऊँगा, इसलिए उन्होंने मुझे उस कोर्स के लिए आवेदन करने को कहा।
उसी क्षण पुलिस इंस्पेक्टर बनने का मेरा सपना चकनाचूर हो गया। अब कोई दूसरा रास्ता नज़र नहीं आ रहा था। ऐसा लग रहा था मानो जीवन एक चौराहे पर आकर रुक गया हो, जहाँ मेरे मन की दिशा और परिस्थितियों की दिशा पूरी तरह अलग थीं।
“यह कोर्स पूरा करने पर इसे कम से कम किसी डेयरी में सरकारी नौकरी तो मिल ही जाएगी,” अण्णा ने कहा।
आई मुस्कुराई और बोली, “गाय-भैंसों की देखभाल करने के लिए कौन सा कोर्स करना पड़ता है? यह तो कोई भी कर सकता है! यह कैसा कोर्स है? इसके लिए कुछ और ढूँढो।”
अण्णा ने जवाब दिया, “क्या तुमने अब तक की उसकी उपलब्धियाँ नहीं देखी हैं? फिलहाल इसके लिए यही एक कोर्स उपलब्ध है।”
“ठीक है, जो आपको सही लगे वही कीजिये” आई ने हाथ हवा में लहराते हुए कहा और पीछे हट गई।
मैंने आवेदन किया और कॉल लेटर का इंतजार किया। खाकी वर्दी पहनने का मेरा सपना हवा में उड़ गया था। मेरी आंखों के सामने भैंसों के बाड़े और उसमें बैठकर दूध दुहाता मैं, ऐसी तस्वीरें उभरने लगीं। मेरी बहनें मुझे “ए दूधवाले..ए दूधवाले…!” कहकर चिढ़ा रही थीं। उनकी हंसी में मुझे मेरी असफलता का दर्द महसूस होने लगा।
अण्णा ने घर आए मेरे दोस्तों को भी बताया,
“बंड्या अब ‘दूध प्रबंधन’ का कोर्स करने जा रहा है।“
मेरे दोस्त मधु ने, जिसके चाचा के पास लगभग पचास-साठ गाय-भैंसें थीं, मेरी ओर देखकर मुस्कुराते हुए अण्णा से कहा,
“अण्णा, हमारे पास इतनी सारी गाय-भैंसें हैं। मैंने कोई कोर्स नहीं किया है, फिर भी मैं पैसे तो कमा रहा हूँ ना?”
अण्णा ने उसे समझाते हुए कहा,
“अरे, इस कोर्स से उसे दूध उत्पादन व्यवसाय की पूरी जानकारी मिल जाएगी। बाद में उसे किसी सरकारी या निजी डेयरी में अच्छी तनख़्वाह वाली सुपरवाइज़र की नौकरी भी मिल सकती है। ये तो अब यही करेगा।“
मधु ने मेरी ओर देखकर हल्की-सी मजबूर मुस्कान दी। उसे समझ में आ गया था कि अण्णा को समझाने की कोशिश करने का कोई फायदा नहीं है।
मधु ने दसवीं के बाद स्कूल छोड़ दिया था और अपने चाचा की भैंसें चराता था। मैं, जो एक दिन पी.एस.आई. बनने का सपना देख रहा था, रोज़ सुबह चार बजे उठकर दौड़ने जाता था। यही मधु हर सुबह मेरे साथ दौड़ने आता था। सुबह-सुबह बाहर घना अँधेरा होता था, मगर मधु ही मेरा साथी होता था। वह अपने घर की ओसरी में सोता था। जब मैं उसे सुबह जल्दी जगाने जाता, तो वह थोड़ा झुंझला जाता; लेकिन उसने कभी मना नहीं किया। वह हमेशा मेरे साथ दौड़ने आता था।
अण्णा के शब्दों में चिंता साफ़ झलक रही थी। दसवीं कक्षा के बाद मेरी ‘प्रगति’ को लेकर वे लगातार चिंतित रहते थे। चूँकि वे स्वयं क्लास-वन श्रेणी के अधिकारी थे, इसलिए वे हमेशा मुझसे कहते थे,
“पी.एस.आई. बनने का सपना मत देखो। आई.ए.एस. या आई.पी.एस. की तैयारी करो। क्लास-वन अधिकारी बनने का प्रयास करो।”
उन्होंने मेरे लिए ‘मनोरमा’ पत्रिका की सामान्य ज्ञान की वार्षिक पुस्तिका भी लाकर दी थी, लेकिन क्रिकेट के जूनून में मैंने उसे कभी हाथ तक नहीं लगाया था।
अब पी.एस.आई. बनने का सपना भी धूमिल हो चुका था। मुझे महसूस होने लगा था कि स्नातक होने की राह लगभग बंद हो गई है। ऐसा लग रहा था कि अब मेरे पास ‘दूध प्रबंधन’ का कोर्स पूरा करके किसी डेयरी में नौकरी ढूँढ़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। अपनी इस स्थिति के लिए मैं स्वयं ही जिम्मेदार था।
इसी बीच, जब मैं इस उलझन भरी स्थिति में था, तभी बाढ़ आयी थी। मैंने सोचा कि इस अफरा-तफरी में शायद अण्णा डेयरी वाले कोर्स की बात भूल जाएंगे, लेकिन मैं गलत था।
इसी बीच जो परिवार हमारे यहाँ शरण लेने आया था, वह भी अपने गाँव वापस चला गया था। एक दिन, जब हम नागोठणे छोड़कर खोपोली जाने का फैसला कर रहे थे, तब अण्णा ने मुझसे कहा,
“देखो, बाढ़ की वजह से सारा यातायात ठप्प पड़ा है। इसलिए डाक से तुम्हारा कॉल लेटर आने की कोई संभावना नहीं है। तुम कल पालघर जाओ। वहाँ से किसी को साथ लेकर दापचरी जाओ और पता करो कि तुम्हारा कॉल लेटर कहाँ गया है। उनसे कहो कि कॉल लेटर पालघर वाले पते पर भेज दें। कॉल लेटर आने तक तुम पालघर में ही रहो। अभी हमारे साथ खोपोली मत आना।”
मैं, जो उस समय अठारह-उन्नीस साल का था, अण्णा की बातें सुनकर हक्काबक्का रह गया। मुझमें पलटकर जवाब देने की हिम्मत नहीं थी, और न ही मुझे कुछ कहने का मौका मिला।
बाढ़ का पानी अभी पूरी तरह उतरा भी नहीं था। उस पूरे इलाके में कामकाज ठप्प पड़ा था और परिवहन का कोई साधन उपलब्ध नहीं था। फिर भी मुझे पालघर के लिए निकलना था।
आई ने अण्णा को समझाने की बहुत कोशिश की।
“सुनिए, ऐसी स्थिति में यह लड़का कहाँ जाएगा? गाड़ियाँ तो चलने दीजिए, फिर यह चला जाएगा।”
लेकिन अण्णा सुनने के मूड में नहीं थे।
रात को आई ने मेरा सामान पैक किया। वह सामान एक बड़ी-सी ट्रंक में रखा गया था। उसमें दो चादरें, एक कंबल और मेरे दो-तीन जोड़ी कपड़े थे।
अगली सुबह आँखों में आँसू लिए मैं घर से निकला। मेरे पीछे घर के सभी लोग चुपचाप खड़े होकर मुझे विदाई दे रहे थे। कोई कुछ बोल नहीं रहा था। एक अजीबसी शांतिपूर्ण विदाई का अनुभव मैं कर रहा था मानो, जैसे मैं फिरसे कभी घर नहीं आ पाउँगा। मैं पीछे मुड़कर देखना चाहता था, लेकिन देख नहीं पाया।
जब मैं गली के मोड़ पर पहुँचा, तो मुझे अपनी माँ की धुंधली आवाज़ सुनाई दी,
“संभलकर जाना…!”
मैंने आँसू पोंछे और सड़क की ओर चल पड़ा।
बाढ़ के पानी से एस.टी. स्टैंड क्षतिग्रस्त हो गया था, इसलिए बस सेवा बंद थी। मुझे दूसरा वाहन पकड़ने के लिए हाईवे तक जाना पड़ा। मेरी उम्र के हिसाब से वह ट्रंक बहुत बड़ी और भारी थी। मैं उसे बारी-बारी से दोनों हाथों में उठाकर ले जा रहा था। लगभग पंद्रह-बीस मिनट बाद जब मैं हाईवे पहुँचा, तो पूरी तरह थक चुका था।
मेरे मन में बार-बार यही सवाल उठ रहा था कि इतना बड़ा बक्सा लेकर मैं पालघर कैसे पहुँचूँगा। सड़क पर उसी बक्से के साथ खड़ा होकर मैं किसी वाहन का इंतज़ार करने लगा। कुछ और लोग भी अपने गाँव जाने के लिए वहीं खड़े थे।
तभी एक ट्रक आया। वह खोपोली की ओर जा रहा था। ड्राइवर ने खिड़की से झाँककर पूछा,
“कहाँ जाना है?”
मैंने पूछा, “क्या आप मुझे पेण तक छोड़ सकते हैं?”
ड्राइवर ने कहा, “आओ, बैठो।”
जैसे ही उसने यह कहा, हम दो-तीन लोग ट्रक में चढ़ गए। ट्रक चल पड़ा। मैं दरवाज़े के पास क्लीनर के बगल में एक लकड़ी के तख्ते पर बैठ गया।
नागोठणे गाँव धीरे-धीरे पीछे छूटता जा रहा था। चारों ओर कीचड़, बहकर आया कूड़ा-करकट और उखड़े हुए पेड़ बिखरे पड़े थे। वातावरण में एक अजीब-सी उमस और सीलन भरी गंध फैली हुई थी। गाँव अब रहने लायक नहीं रह गया था।
मैं इस चिंता में डूबा हुआ था कि पालघर कैसे पहुँचूँगा। मैंने इससे पहले कभी अकेले यात्रा नहीं की थी। मन तो बार-बार वापस लौट जाने को कह रहा था, लेकिन अब मेरे पास कोई विकल्प नहीं था।
ड्राइवर ने मुझे पेण नाका पर उतार दिया और फिर खोपोली की ओर चला गया। मैं उस बड़ी-सी ट्रंक के साथ सड़क पर खड़ा रह गया। यहाँ यातायात कुछ हद तक सुचारू था। थोड़ी देर बाद मुंबई जाने वाली एक बस आई। मैंने टिकट खरीदा और सीट पर बैठ गया। यात्रा के दौरान मैंने एस.टी. कंडक्टर से पालघर पहुँचने का रास्ता भी पूछ लिया।
मैं सुबह सात बजे चाय बिस्कीट खा कर घर से निकला था। अब दोपहर के साढ़े बारह बज चुके थे। आई ने मेरे लिए डिब्बे में सब्ज़ी और रोटियाँ रख दी थीं। मैंने डिब्बा खोला और बस में बैठे-बैठे खाने लगा। हर निवाले के साथ मुझे घर की याद आती रही और मेरी आँखों से आँसू बहते रहे।
मैं मुंबई सेंट्रल स्टेशन पर उतरा तब लगभग दोपहर ढलने को आ गयी थी। मैंने वहाँ से पालघर के लिए ट्रेन पकड़ी ट्रेन के अंदर वह बड़ी ट्रंक चढ़ाना और ले जाना मेरे लिए काफी मुश्किल रहा। उस बड़ी ट्रंक की वजहसे सभी लोग मेरी तरफ बड़ी अजीब नज़रसे देख रहे थे। लगभग डेढ़-दो घंटे के सफर के बाद करीब करीब साढ़े छह-सात बजे मैं पालघर पहुँचा।
वहाँ से ताँगा करके मैं आजी-अब्बा के घर पहुँचा। ताँगे की आवाज़ सुनकर आजी बाहर आईं। मुझे बड़ा-सा संदूक लेकर आते देख वह घबरा गईं और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगीं। उन्हें लगा कि घर के बाकी लोग बाढ़ में बह गए हैं और मैं ही अकेला बचा हूँ। जोर से चिल्लाकर उसने अब्बा को बाहर बुलाया,
“हे भगवान! अरे, जल्दी बाहर आओ… देखो तो सही, यह अकेला ही आया है। पता नहीं क्या हुआ है?”
आजी-अब्बा ने अख़बारों से नागोठणे की बाढ़ की खबर सुनी थी। संचार के सभी साधन ठप होने के कारण उन्हें हमारी स्थिति के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। उन्हें बस इतना पता था कि हमारा तबादला उस गाँव में हुआ था, जो बाढ़ में तबाह हो गया था। जब उसने मुझे अचानक एक बड़ा सा बक्सा लेकर आए हुए देखा, तो वह डर गई। अब्बा भी घबराते हुए मेरे पास आए और बोले,
“क्या हुआ? घर के सब लोग कहाँ हैं?”
“बताता हूँ, बताता हूँ… सब ठीक है।”
जैसे ही मैंने उन्हें ये कहा, वे दोनों थोड़ा शांत हो गए। घर में जाकर मैंने उन्हें पूरी स्थिति और अपने आने का उद्देश्य बताया, जिससे मेरी आजी का मन भी शांत हो गया।
सुबह मैं और आजी दापचरी गए। मुंबई–अहमदाबाद राष्ट्रीय राजमार्ग पर तलासरी के पास दापचरी में एक विशाल सरकारी डेयरी थी। महाराष्ट्र सरकार ने वहाँ ‘डेयरी उत्पादन व्यवसाय प्रशिक्षण केंद्र’ शुरू किया था। घने पेड़ों के बीच स्थित इस डेयरी में अत्याधुनिक प्रयोगशाला, अनुसंधान केंद्र, छात्रों के लिए छात्रावास, प्रशिक्षण केंद्र, कर्मचारियों के लिए आवास और खेलकूद के लिए मैदान जैसी सभी सुविधाएँ थीं।
इस विशाल डेयरी में विभिन्न नस्लों की सैकड़ों देसी और विदेशी गायें तथा भैंसें थीं। इन जानवरों के लिए आधुनिक बाड़े बनाए गए थे और उनके रहने के लिए अलग-अलग खंड निर्धारित किए गए थे। आधुनिक बाड़ों में साफ चारा, पीने के लिए बहता पानी, पंखे तथा जल-निकासी की व्यवस्था थी। कहीं भी कूड़ा-करकट या गंदगी नहीं थी। सफाई कर्मचारी लगातार सफाई करते रहते थे।
कार्यालय में पूछताछ करने पर मुझे पता चला कि मेरा चयन हो गया था और मुझे ‘कॉल लेटर’ नागोठणे के पते पर भेजा गया था। अण्णा सही कह रहे थे, बाढ़ के कारण ‘कॉल लेटर’ कहीं अटक गया था। क्लर्क ने मुझे ‘कॉल लेटर’ की एक प्रति दी। मैंने बड़ी अनिच्छा से उसे स्वीकार किया।
मुझे प्रवेश शुल्क जमा करना था, जो मैं साथ नहीं लाया था। उसने मुझे शुल्क जमा करके दो सप्ताह के भीतर ज्वाइन करने को कहा। हम ‘कॉल लेटर’ लेकर पालघर लौट आए।
इस बीच परिवार के सभी लोग खोपोली चले गए थे। मैं पालघर में एक दिन रुका और फिर खोपोली के लिए निकल गया। मेरा मामा मेरे साथ आया था। घर पहुँचकर मैंने अण्णा को सब कुछ विस्तार से बताया और यह भी कहा कि मुझे प्रवेश शुल्क जमा करना है।
अण्णा ने कहा, “ठीक है, एडमिशन ले लो।”
अभी भी दस-बारह दिन बाकी थे। अब मुझे हमेशा के लिए घर छोड़ना था। मेरी भूख लगभग खत्म हो गई थी। मुझे आरे डेयरी, महानंद डेयरी और अमूल दूध के अजीब-अजीब सपने आने लगे। कभी-कभी उस प्रशिक्षण केंद्र की गायें और भैंसें भी मुझे सपनों में दिखाई देने लगीं।
एक बार सपने में, जब तबेले में बैठकर मैं भैंस दुह रहा था; तब भैंस ने मुझे ज़ोर से लात मारी। उसी समय मैं चीखते हुए बिस्तर से गिर पड़ा। मेरा मामा मेरे बगल में सो रहा था। वह डर के मारे जाग गया और पूछने लगा,
“क्या हुआ, क्या हुआ..?”
मैं उसे क्या बताता…?
इसी बीच मैंने एक और सपना देखा, मैं एक बड़ी विदेशी जर्सी गाय के ऊपर बैठकर हाथ में लकड़ी लेकर घूम रहा हूँ। मैं, जो खाकी वर्दी पहनकर, बुलेट मोटरसाइकिल पर बैठकर, कमर पर पिस्तौल बाँधे और आँखों पर काले रे-बैन एविएटर गॉगल लगाकर घूमने के सपने देखा करता था, वही मुझे, अब भैंस पर सवार होकर हाथ में लकड़ी पकड़े घूमने के सपने आने लगे थे।
अब हकीकत सपनों से कहीं अधिक कठोर हो गई थी। जैसे फाँसी पर लटका कैदी अपने आख़िरी दिन गिनता है, वैसे ही मैं भी घर पर बचे अपने दिनों को गिन रहा था। दापचरी जाने में अब केवल दो दिन बचे थे।
आई मेरा सामान पैक करने लगीं। आखिरकार मैंने अण्णा से कहा,
“मुझे एक मौका दीजिए। मैं खोपोली में कला पाठ्यक्रम में दाखिला लूँगा। मैं मन लगाकर पढ़ाई करूँगा।”
अण्णा ने पूछा, “क्या तुम दापचरी नहीं जाना चाहते हो?”
मैंने कुछ नहीं कहा।
मुझे चुप देखकर आई ने कहा,
“अगर वह नहीं जाना चाहता, तो तुम उसे क्यों मजबूर कर रहे हो?”
अण्णा बोले, “बी.ए. पूरा करने के बाद यह क्या करेगा? इसमें तीन साल लगेंगे। उसके बाद क्या करेगा?”
मैंने कहा, “मैं यूपीएससी और एमपीएससी के लिए कोशिश करूँगा।”
“कोशिश…? ठीक है, जो चाहो करो।”
अण्णा ने आई कि ओर देखा और जैसे नज़र से हि कहा,
“अब देखते हैं ये क्या गुल खिलाता है…!” और इस तरह दापचरी के ‘दूध प्रबंधन’ का अध्याय समाप्त हो गया।
मेरा मामा दो दिन रहकर फिर पालघर लौट गया। अब मेरे सामने बी.ए. पूरा करने और प्रतियोगी परीक्षा पास करने की चुनौती थी। नियति ने मुझे एक और मौका दिया था और मेरे सपनों को फिर से संवार रही थी।
अण्णा को जब पता चला कि मेरा दाखिला अस्वीकार कर दिया गया है, तो वे स्वयं मेरे साथ कॉलेज आए। प्राचार्य को अपना परिचय देते हुए उन्होंने पूरी स्थिति समझाई। उसके बाद मुझे तुरंत दाखिला मिल गया।
इन सभी परिस्थितियों से गुज़रते हुए मैंने बहुत कुछ सीखा और यह महसूस किया कि,
“दुनिया में कोई भी असफलता हमारे लक्ष्यों को समाप्त नहीं करती; यह तो बस हमें एक नया रास्ता दिखाती है। परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, जो लोग दृढ़ रहते हैं, प्रयास करते हैं और आत्मविश्वास रखते हैं, वे अंततः सफल होते हैं। यदि हम साहस और धैर्य के साथ अपने सपनों का पीछा करें, तो हर बाधा एक नया अवसर बन जाती है।”
क्रमशः
