हम खोपोली में शिळफाटा नाम की जगह पर रहते थे। शिळफाटा से खोपोली गाँव लगभग चार-पाँच किलोमीटर दूर था। कॉलेज जाने के लिए बस से ही जाना पड़ता था। कॉलेज शुरू हुए तीन महीने हो चुके थे।
प्रवेश लेने के दूसरे दिन मैं कॉलेज गया। वहाँ का वातावरण देखकर मैं थोड़ा घबरा गया।
अधिकांश विद्यार्थी जीन्स, शर्ट और स्पोर्ट्स शूज़ पहनकर आते थे।
और मैं?
पैरागॉन की नीली चप्पल, पुरानी पैंट और शर्ट पहनकर कॉलेज गया था। हाथ में केवल एक ही नोटबुक थी। बाकी छात्रों के पास बैग थे। मुझे बहुत झिझक महसूस हो रहा थी।
बी.ए. प्रथम वर्ष की कक्षा खोजते-खोजते आखिर मैं कक्षा तक पहुँच गया। क्लास शुरू हो चुका था। प्रोफेसर से पूछकर मैं अंदर गया। पीछे की बेंच पर मेरे जैसा ही साधारण कपड़े पहने एक लड़का बैठा था। मैं उसके पास जाकर बैठ गया। सर ने मेरा परिचय पूछा और देर से प्रवेश लेने का कारण भी पूछा। मैंने नागोठणे में आई बाढ़ और खोपोली में हमारे स्थानांतरण की पूरी कहानी बताई। सर ने सहानुभूति दिखाते हुए मुझे बैठने के लिए कहा।
एक दिन हमारे कॉलेज का यू.आर. मेरे पास आया और बोला,
“तुम कॉलेज में जूते पहनकर क्यों नहीं आते?”
मैंने पूछा, “मेरे पास नहीं हैं। क्यों? क्या हुआ?”
वह बोला, “कुछ स्टूडेंट पूछ रहे थे कि तुम्हारे पास जूते नहीं हैं क्या?”
मैंने फिर पूछा, “लेकिन मेरे बारे में ही क्यों पूछ रहे हैं? कई स्टूडेंट बिना जूतों के ही आते हैं।”
वह बोला, “मुझे नहीं पता। उन्होंने तुम्हारे बारे में पूछा इसलिए बता दिया। थोड़ा ठीक-ठाक बनकर आया करो कॉलेज में।”
“ठीक है,” मैंने कहा।
मैंने मन ही मन तय कर लिया था कि अब अण्णा से कपड़े या जूते कुछ भी नहीं माँगूँगा। जो है उसी में काम चलाऊँगा। उन्हें और परेशानी क्यों दूँ? उन्होंने मेरी बी.ए. में प्रवेश लेने की इच्छा पूरी की थी। मेरे पिछले रिकॉर्ड को देखते हुए उन्होंने मुझे दोबारा कॉलेज में प्रवेश दिलाकर एक तरह से जोखिम ही उठाया था। अब उस अवसर को सफल बनाना मेरी जिम्मेदारी थी। कपड़े-जूते मेरे लिए कुछ मायने नहीं रखते थे।
मैं बाकी बातों को नज़रअंदाज़ कर नियमित कॉलेज जाने लगा। मेरा प्रवेश देर से हुआ था और सभी विषयों का पाठ्यक्रम मेरे लिए काफी पीछे रह गया था। एक-दो लड़कों से नोट्स लेकर मैंने छूटा हुआ पाठ्यक्रम लिख लिया और पढ़ाई शुरू कर दी।
धीरे-धीरे सहपाठियों से मेरी पहचान बढ़ने लगी। कुछ दोस्तों के साथ मैं जिम जाने लगा। सारी निराशा, अंदर का गुस्सा और बेचैनी मैं लोहे के वज़नों पर निकालने लगा। रोज दो-दो घंटे व्यायाम करके मैं खुद को फिर से गढ़ने लगा।
कक्षा में मैं हमेशा आखिरी बेंच पर बैठता था। कॉलेज में सह-पाठ्यक्रम गतिविधियाँ बहुत थीं। हर विभाग का अपना एसोसिएशन था; इंग्लिश एसोसिएशन, हिंदी एसोसिएशन, मराठी एसोसिएशन आदि। इनमें कहानी लेखन, कविता लेखन, निबंध, सामान्य ज्ञान, गायन और भाषण प्रतियोगिताएँ होती थीं।
इन प्रतियोगिताओं में पहले तीन विजेताओं के नाम बोर्ड पर बड़े अक्षरों में लिखे जाते थे। ऐसी प्रतियोगिताओं के परिणाम तीनों संघों के ‘विभागाध्यक्षों’ द्वारा निर्धारित किए जाते थे, जो आपस में विचार-विमर्श करने के लिए एक साथ आते थे।
मेरे वर्ग का एक छात्र रविंद्र इन प्रतियोगिताओं में हमेशा भाग लेकर पुरस्कार जीतता था। वह पढ़ाई में भी बहुत तेज था। पहले टर्म में वह क्लास में प्रथम आया था और बारहवीं में भी टॉपर था। वह स्वयं हिंदी और मराठी संघ के कार्यक्रमों को आयोजित करके उन्हें संपन्न करता था।
क्रिकेट के अलावा मैंने कभी किसी प्रतियोगिता में भाग नहीं लिया था। इसीलिए मैं उन संघों द्वारा आयोजित प्रतियोगिताओं से रहता था। क्रिकेट मेरा जुनून था। अपने खेल से मैंने कॉलेज की चयन समिति को प्रभावित किया और कॉलेज टीम में ओपनिंग बैट्समैन के रूप में जगह बनाई।
क्रिकेट के लिए विशेष जूते चाहिए थे। अण्णा से माँगे बिना मैंने माँ को धीरे से बताया। उसने मुझे अपने कुछ पैसे दिए और उन्ही पैसोंसे मैंने क्रिकेट के जूते खरीदे। क्रिकेट की फ्लैनल (ट्रैक पैंट और टी-शर्ट) मुझे कॉलेज से मिल गई थी।
मुंबई विश्वविद्यालय के अंतर्गत होने वाली क्रिकेट प्रतियोगिता के लिए हम मुंबई गए। आज़ाद मैदान में हमारा पहला मैच ठाणे के बेडेकर कॉलेज से था। इस प्रतियोगिता में हमारे कॉलेज ने अब तक एक भी मैच नहीं जीता था।मैच तीस ओवर का था। मैंने ओपनिंग करते हुए चालीस रन बनाए। हमारी टीम ने कुल एकसौ तीस रन बनाए और उनमें सबसे ज्यादा रन मेरे थे। गेंदबाज़ी में मैंने दो विकेट भी लिए।हमने बेडेकर कॉलेज को नब्बे रन पर ऑल-आउट कर दिया और मैच जीत लिया।
मुंबई विश्वविद्यालय की प्रतियोगिता में यह हमारे कॉलेज की पहली जीत थी। मुझे “मैन ऑफ द मैच” घोषित किया गया।कॉलेज में इस जीत की बहुत चर्चा हुई क्योंकि मुंबई यूनिवर्सिटी क्रिकेट टूर्नामेंट में यह कॉलेज की पहली जीत थी। कॉलेज के ट्रस्टीज़ ने एक विशेष समारोह में हमारा सम्मान किया।
दूसरे लीग मैच में, हमारा मुकाबला उल्हासनगर कॉलेज से हुआ। उस मैच में मैंने पचपन रन बनाए। हमने उल्हासनगर कॉलेज को एकसौ साठ रन का लक्ष्य दिया। उन्होंने अच्छा खेलते हुए हमें एक विकेट से हरा दिया। हम जीत के लिए मैच को आखिरी ओवर तक खींच ले गए थे; लेकिन बदकिस्मती से, हमें हार का सामना करना पड़ा और हम टूर्नामेंट से बाहर हो गए।और हम प्रतियोगिता से बाहर हो गए।
क्रिकेट के अलावा कॉलेज की वेटलिफ्टिंग प्रतियोगिता में भी मैंने भाग लिया और तीसरा स्थान प्राप्त किया। मैं हर तरह से खुद को साबित करने की कोशिश कर रहा था, मैदान में, जिम में और पढ़ाई में। धीरे-धीरे वह लड़का जो चप्पल पहनकर कॉलेज आता था और आखिरी बेंच पर बैठता था, अपनी पहचान बनाने लगा था।
मेरी पढ़ाई का जो हिस्सा पीछे रह गया था, वह अब मैंने पूरा कर लिया था। ‘सोशियोलॉजी’ विषय के मेरे आने से पहले सिर्फ एक-दो ही लेक्चर हुए थे। उसके बाद उस विषय के सर ने कई महीनों तक कोई लेक्चर ही नहीं लिया था। उस दिन भी उस विषय का पीरियड नहीं हुआ। प्रोफेसर रोज कॉलेज आते थे, लेकिन पढ़ाते नहीं थे।
हम तीन-चार छात्र इसी विषय पर चर्चा कर रहे थे, तभी हिंदी विषय पढ़ाने वाली प्राध्यापिका वहाँ आईं और मुझसे बोलीं,
“क्या तुम कॉलेज में नए एडमिशन हो? तुमने फर्स्ट ईयर के लिए हिंदी सब्जेक्ट क्यों नहीं लिया?”
“एडमिशन लेते समय मुझे पता ही नहीं था कि कौन-सा सब्जेक्ट लेना है। थोड़ी जल्दबाज़ी में चुन लिया।”
“तो अभी भी सब्जेक्ट बदल सकते हो।”
फिर उन्होंने मेरे साथ खड़े छात्रों से कहा,
“अरे, इसको बोलो हिंदी विषय लेने के लिए”
“ देखता हूँ।“ मैंने कहा।
उनके जाते ही, उनमें से एक ने मुझसे कहा,
“मैडम इतना कह रही हैं, तो हिंदी विषय ले लो “
“अरे, एडमिशन मैंने जल्दी में लिया था और बाद में मुझे एमपीएससी परीक्षा देनी है। मुझे अभी उसकी पढ़ाई कॉलेज के सिलेबस के साथ ही पूरी करनी है, इसलिए मैंने भूगोल और समाजशास्त्र ले लिया। हिंदी लेके क्या करूँगा?”
अगले दिन एक विद्यार्थी ने जाकर उन प्राध्यापिका से कहा,
“वह आपके विषय की बदनामी कर रहा है। सबको बोलता है कि हिंदी बेकार सब्जेक्ट है।”
दूसरे दिन मैडम ने मुझे स्टाफरूम में बुलाया। मुझे देखते ही उन्होंने कहा,
“तुम्हें मेरे सब्जेक्ट से कोई समस्या है क्या?”
“ऐसी कोई बात नहीं है, मैडम।”
“तुम मेरे सब्जेक्ट की बदनामी कर रहे हो। सबको कहते फिर रहे हो कि हिंदी बेकार सब्जेक्ट है, उसमें कोई स्कोप नहीं है वगैरह…”
मैंने कहा,
“मॅडम, हम दोस्तों में बात हो रही थी। मैंने सिर्फ इतना कहा था कि मुझे यूपीएससी और एमपीएससी की तैयारी के लिए इंग्लिश और सोशिओलॉजी सब्जेक्ट जरूरी है। हिंदी इतना ज़रूरी नहीं है।”
उसके बाद उन्होंने मुझे बहुत कुछ सुनाया। मैं गर्दन निचे झुकाये उनका कहना सुन रहा था । उन छात्रों से हुई बातचीत के बाद मैंने हिंदी विषय पर किसी और से बात नहीं की थी और वह विषय वहीं खत्म हो गया था; लेकिन उनमें से एक ने मैडम को मेरे बारे में कुछ अलग ही बता दिया, जिससे मामला और गरमा गया था। बाद में मुझे पता चला कि आग किसने लगाई थी। ज़ाहिर है, मैंने उस व्यक्ति से दूर रहने का फैसला किया।
मैंने ‘सोशियोलॉजी’ विषय इसलिए लिया था क्योंकि वह एमपीएससी और यूपीएससी के लिए महत्वपूर्ण था। वार्षिक परीक्षा में अब सिर्फ एक महीना रह गया था। मैंने लाइब्रेरी से उस विषय की किताब लेकर पढ़ाई शुरू कर दी थी, लेकिन उस विषय के प्रोफेसर की ओर से हमें अब तक कोई मार्गदर्शन नहीं मिला था।
वे प्रोफेसर रोज स्टाफरूम में आते थे, लेकिन लेक्चर नहीं लेते थे। एक-दो छात्रों ने उनसे अनुरोध भी किया था, लेकिन वे उसे अनदेखा कर देते थे। इस बात को प्रिंसिपल के पास ले जाने की किसी की हिम्मत नहीं हो रहा थी। सबको डर था कि अगर प्रोफेसर को पता चल गया तो वे हमें फेल कर देंगे।
एक दिन उनका पीरियड था, लेकिन प्रोफेसर साहब स्टाफरूम में बैठकर तंबाकू मलते हुए गपशप कर रहे थे। हम छह-सात छात्र क्लास में उनका इंतज़ार कर रहे थे।
एक छात्र ने मुझसे कहा,
“तुम जाकर टीचर से क्यों नहीं पूछ लेते, क्या वो लेक्चर लेने वाले हैं या नहीं?”
“नहीं यार, अगर वे मुझपे नाराज़ हो गए तो? तुम खुद क्यों नहीं जा रहे हो?”
“अरे, मैंने उनसे एक बार पूछा था, लेकिन तब वो मुझ पर चिल्लाया था।”
“तो अब मुझे उनके पास क्यों भेज रहे हो ताकि वो मुझ पर चिल्लाएँ?”
“नहीं, तुम नए हो, इसलिए शायद वो तुम पर न चिल्लाएँ। इसीलिए मैंने कहा था, बस एक बार उनसे पूछ लो।”
आखिर हाँ-ना करते हुए मैं उठ गया। क्योंकि हमें उस विषय के लेक्चर की बहुत जरूरत थी और उसका पाठ्यक्रम अभी तक शुरू ही नहीं हुआ था।
मैंने स्टाफरूम का दरवाज़ा खटखटाया और पूछा कि क्या मैं अंदर आ सकता हूँ। उन्होंने मुझे अंदर बुला लिया।
मैंने कहा,
“सर, क्या आज आप लेक्चर लेने वाले हैं? परीक्षा पास आ रहा है, इसलिए सब पूछ रहे हैं।”
उन्होंने मुझे ऊपर-नीचे देखा और अचानक ऊँची आवाज़ में बोले,
“तू कौन होता है मुझे ‘लेक्चर लो’ कहने वाला? ज़्यादा होशियार बन रहा है क्या?”
“सर, सिलेबस बाकी है। बाकी विद्यार्थी भी पूछ रहे थे इसलिए आपसे पूछ रहा हूँ…”
वे तुरंत बोले,
“तुम लोगों को खुद पढाई करने नहीं आती क्या?”
“सर, ऐसी बात नहीं है…”
वे गुस्से में बोले,
“तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे लेक्चर लेने को कहने की? जाओ… नहीं लेता लेक्चर। क्या कर लोगे?”
मुझे समझ नहीं आया कि मैं क्या कहूँ। बाकी प्रोफेसर भी हमें देख रहे थे।
“सॉरी, सर,” कहकर मैं बाहर निकल आया।
झुकी हुई नज़र से मैं क्लास में लौटा। मेरा उतरा हुआ चेहरा देखकर बाकी छात्र पूछने लगे,
“क्या हुआ?”
“कुछ नहीं। बाद में लेक्चर लेंगे, ऐसा कहा है।” मैंने झूठ मुठ हो कह दिया।
“अब बैठो और इंतज़ार करो… भगवान जाने वह कब लेक्चर लेंगे।”
बिना वजह हुए इस अपमान से मेरा चेहरा गर्म हो गया था। इतनी-सी बात पर उस आदमी ने मुझे सबके सामने अपमानित कर दिया था। मैंने तो सिर्फ इतना ही पूछा था, “क्या आप लेक्चर लेने वाले हैं?” लेकिन उसमें उन्हें अपना अपमान क्यों लगा, यह मुझे आज तक समझ में नहीं आया।
अब मुझे लगने लगा था कि मैंने जैसे साँप की पूँछ पर पैर रख दिया है। मुझे महसूस हुआ कि ‘सोशियोलॉजी’ विषय में वे मुझे जरूर फेल कर देंगे। वार्षिक परीक्षा में किसी एक विषय में ए.टी.के.टी. लेना मेरे लिए संभव नहीं था। मैं अण्णा के सामने कभी खड़ा नहीं हो पाता।
एक-दो दिन ऐसे ही बीत गए। कॉलेज में सबको पता चल गया कि मेरा उस प्रोफेसर से झगड़ा हो गया है। आखिरकार मैंने ‘सोशियोलॉजी’ विषय छोड़ने का फैसला कर लिया।
अब मैं सोचने लगा कि दूसरा कौन-सा विषय लूँ। तभी मुझे याद आया कि हिंदी की प्राध्यापिका ने पहले कहा था, “तुमने मेरा सब्जेक्ट क्यों नहीं लिया?” इसलिए मैंने तय किया कि उनसे ही पूछूँ। लेकिन उनके सामने किस मुँह से जाऊँ, यह बड़ी समस्या थी। क्योंकि किसी ने पहले ही उनके मन में मेरे बारे में गलत धारणा बना दी थी। और इसके बारे में मैं उनसे बहुत कुछ सुन चूका था।
‘गरजमंद बावला होता है’ ऐसा कहते है। आखिर मान-अपमान सब भूलकर मैं उनसे मिलने गया। उनका क्लास चल रहा था, इसलिए मैं कॉरिडोर में खड़ा होकर क्लास खत्म होने का इंतज़ार करने लगा।
मन में कई विचार आ रहे थे। अब परीक्षा में सिर्फ एक महीना बचा था। अगर उन्होंने मना कर दिया तो बहुत मुश्किल हो जाती। और अगर मान भी लिया, तो हिंदी का पूरा सिलेबस एक महीने में पूरा करना लगभग असंभवही था।
आखिर क्लास खत्म हुआ। लगभग बीस-पच्चीस विद्यार्थियों ने यह विषय लिया था। मुझे दरवाज़े के बाहर खड़ा देखकर उन्होंने मुझे अंदर बुलाया।
वे मेज़ पर रखी अपनी किताबें उठाकर अपने पर्स में रख रही थी ।
“कैसे हो?” उन्होंने मेरी ओर देखे बिना पूछा।
“मैं ठीक हूँ, मैडम।”
“बोलो, क्या बात है?” यह उनका दूसरा ठंडा सवाल था। उनको जाने की जल्दी थी।
इन दो सवालों में मुझे उनकी मेरे प्रति उदासीनता का एहसास हुआ। हिंदी विषय लेने की मेरी उम्मीदें इन दो सवालों के साथ ही खत्म होने लगी थीं।
मैंने किसी तरह हकलाते हुए कहा,
“मैडम, मैं हिंदी सब्जेक्ट लेना चाहता हूँ।”
“अरे वाह! अचानक ये फैसला क्यों ले लिया तुमने?” उन्होंने व्यंग्य से पूछा, और अपना पर्स उठाते हुए और मेरी तरफ देखे बिना ही चल पड़ी ।
मैंने उनके पीछे पीछे चलते हुए पूछा,
“क्या कुछ हो सकता है, मैडम?”
“क्यों, अभी क्या हुआ? आप एमपीएससी की तैयारी कैसे करोगे? हिंदी आपके लिए ज़रूरी नहीं थी, है ना?” उन्होंने फिर व्यंग्य से पूछा और चलने की गति बढ़ा दी।
मैंने कुछ नहीं कहा।
कॉलेज खत्म हो चुका था। सभी छात्र कक्षा छोड़कर मुख्य द्वार की ओर जा रहे थे। सीढ़ियों से उतरते हुए उन्होंने पूछा,
“कौन सा विषय छोड़ रहे हो?”
“समाजशास्त्र।”
“क्यों? प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तो यह तुम्हारा पसंदीदा विषय था।” उनका चुभनेवाला वार्तालाप अभी खत्म नहीं हुआ था।
“हाँ… लेकिन कुछ ऐसा हो गया…”
यह कहते हुए, मैंने सीढ़ियों से उतरते हुए उसे सारी सच्चाई बता दी। अब तक उनके पूरे व्यवहार से मैं समझ गया था कि वह मुझे टालना चाहती है। लेकिन मुझे यह आखिरी कोशिश करनी ही थी; वरना समाजशास्त्र में मेरा विकेट गिरना तय था।
मैंने उनसे फिर पूछा,
‘कुछ हो सकता है क्या, मैडम?’
बातचीत करते–करते हम गेट से बाहर आ गए और सड़क पर चलने लगे।
“परीक्षा को एक महीना भी नहीं बचा है और तुम अभी आए हो, देखना पड़ेगा” उन्होंने कहा।
“आपसे बहुत उत्तम है मैडम ” मेरी बात में अब स्पष्ट रूप याचना दिखने लगी थी।
“मुझे इसके बारे में कल ही पता चला। स्टाफ रूम में सब इसी बारे में बात कर रहे थे। सब कह रहे हैं कि इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है।“
मेरी उम्मीद फिर से जाग उठी।
“हाँ मैडम, मैंने ऐसा कुछ भी नहीं कहा जिससे उन्हें इतना गुस्सा आए।”
वे कुछ देर सोच में पड़ गईं और फिर बोलीं,
“लेकिन परीक्षा में अब एक महीना भी नहीं बचा है। ऐसे में कॉलेज तुम्हें विषय बदलने की अनुमति शायद नहीं देगा। और अगर दे भी दी, तो इतना बड़ा सिलेबस तुम कैसे पूरा करोगे?”
मैंने दृढ़ता से कहा,
“मैं कर लूँगा।”
“अरे, पागल हो क्या? तुम्हें हिंदी इतना आसान विषय लगता है क्या? मालूम है सिलेबस कितना है? तीन उपन्यास हैं और बीस कविताएँ!”
उन्होंने एक के बाद एक सवाल पूछकर मेरे सामने मुश्किलों का पहाड़ खड़ा कर दिया। उनके किसी भी सवाल का जवाब मेरे पास नहीं था।
मेरी असहाय स्थिति देखकर आखिर में वे बोलीं,
“ठीक है। मैं कल प्रिंसिपल से बात करती हूँ। अगर उन्होंने हाँ कहा, तो मैं तुम्हें हिंदी विषय लेने दूँगी।”
“थैंक यू, मैडम!” मैंने राहत की साँस लेते हुए कहा।
घर पर मैंने इस बारे में कुछ भी नहीं बताया था। उस रात मैं बहुत सोचता रहा, मुझे नींद भी नहीं आई। अगले दिन मैं कॉलेज गया। दो लेक्चर के बाद सोशियोलॉजी का पीरियड था, लेकिन वह हमेशा की तरह ‘फ्री’ ही रहा।
मैं हिंदी की प्राध्यापिका से मिलने उनके क्लास में गया, लेकिन वे आई ही नहीं थीं। तभी कॉलेज का चपरासी मुझे ढूँढते हुए हमारी पुरानी बिल्डिंग में आया और बोला कि प्रिंसिपल ने मुझे बुलाया है।
मैं प्रिंसिपल से मिलने गया। उनके केबिन में हिंदी की प्राध्यापिका बैठी हुई थीं।
प्रिंसिपल ने पूछा,
“तुम इस समय हिंदी विषय क्यों लेना चाहते हो? इसके पीछे क्या कारण है? इतने दिन क्या सो रहे थे?”
मैंने कहा,
“सर, सोशियोलॉजी विषय के अभीतक सिर्फ दो लेक्चर हुए है । हमें उस विषय के प्रोफेसर से कोई मार्गदर्शन नहीं मिला है, इसलिए मैंने यह निर्णय लिया है।”
प्रिंसिपल ने आश्चर्य से कहा,
“अरे! यह क्या मामला है? ऐसा कैसे हो सकता है? हमने तो सभी प्रोफेसरों को शुरू में ही उनका टाइमटेबल दे दिया था।”
उन्होंने घंटी बजाकर चपरासी को बुलाया और कहा,
“दत्ता, जरा कांबळे सर को बुलाकर लाओ।”
फिर उन्होंने हिंदी की प्राध्यापिका को जाने के लिए कहा, लेकिन मुझे वहीं रुकने को कहा।
थोड़ी देर बाद कांबळे सर आ गए। मुझे देखते ही वे चौंक गए। मेरी तरफ देखते हुए वे कुर्सी पर बैठ गए।
प्रिंसिपल ने उन्हें पूछा,
“सुना है कि आपने अब तक फर्स्ट ईयर के सिर्फ दो लेक्चर लिए है? आपको टाइमटेबल मिला है ना?”
कांबळे सर बोले,
“हाँ, टाइमटेबल मिला है।”
प्रिंसिपल ने कहा,
“तो फिर पुरे साल में बाकी के लेक्चर न लेने का कारण बताइए।”
कांबळे सर गुस्से से मेरी तरफ देखते हुए बोले,
“क्या इसने मेरी शिकायत की है?”
प्रिंसिपल ने कहा,
“अरे नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। इसे दूसरा विषय लेना था इसलिए यह आया है। इसका कहना है कि सोशियोलॉजी विषय के अब तक सिर्फ दो ही लेक्चर हुए हैं और उसके बाद नहीं हुए, चूंकि उस विषय पर कोई मार्गदर्शन नहीं है, वह कोई दूसरा विषय लेना चाहता है।क्या यह सही है?”
कांबळे सर चुप रहे। वे कभी मेरी तरफ तो कभी प्रिंसिपल की तरफ देखने लगे।
प्रिंसिपल ने कहा,
“सर, मैं क्या कह रहा हूँ, आपको समझ में आ रहा है ना? उसे छोड़िए, आप बताइए।”
फिर भी कांबळे सर चुप रहे। जैसे उनकी बोलती ही बंद हो गई हो।
“ठीक है, अगर आप कुछ कहना नहीं चाहते तो रहने दीजिए। लेकिन अब तक आपने प्रथम वर्ष कला शाखा की अपनी कक्षा के लेक्चर क्यों नहीं लिए, इसका विस्तृत लिखित स्पष्टीकरण तुरंत दीजिए।”
कांबळे सर गुस्से में उठकर चले गए।
प्रिंसिपल ने मुझे भी जाने के लिए कहा। मैं ऑफिस से बाहर आया। थोड़ी दूरी पर कांबळे सर दो-तीन प्रोफेसरों के साथ खड़े बातें कर रहे थे। मुझे बाहर आते देखकर वे मेरी तरफ इशारा करके कुछ कहने लगे।
अगले दिन हिंदी की प्राध्यापिका ने मुझसे कहा,
“सर ने कहा है कि सब्जेक्ट चेंज के लिए आवेदन दे दो।”
मैंने तुरंत आवेदन लिखकर ऑफिस में जमा कर दिया।
कॉलेज छूटते समय मैडम ने कहा,
“तुम्हारा आवेदन सर ने मंजूर कर लिया है, लेकिन तुम हिंदी का सिलेबस कैसे पूरा करोगे? बीस कविताएँ और तीन उपन्यास हैं और सिर्फ तीन हफ्ते बचे हैं।”
“मैं कर लूँगा,” कहकर मैंने हिंदी की क्लास जॉइन कर ली।
इतने कम समय में बाकी पाँच विषयों के साथ हिंदी का पूरा सिलेबस पढ़ना बहुत कठिन काम था। बाकी विषयों के लेक्चर मैंने समय पर अटेंड किए थे, इसलिए उनका अध्ययन नियंत्रण में था। लेकिन हिंदी का पूरे साल का पाठ्यक्रम मुझे नए सिरे से सिर्फ बीस दिनों में पूरा करना था। मैं रात देर तक जागकर पढ़ाई करने लगा।
जब बाकी स्टुडन्टस को पता चला कि मैंने सोशियोलॉजी छोड़कर हिंदी विषय लिया है, तो मेरे साथ एक-दो और छात्रों ने भी हिंदी ले लिया। हम हिंदी के एक्स्ट्रा क्लास में बैठने लगे। प्राध्यापिका हमें सही मार्गदर्शन दे रहा थीं।
मैं सब कुछ भूलकर पूरी मेहनत से पढ़ाई करने लगा। इसके पीछे सिर्फ एक कारण था, अण्णा ने मुझ पर विश्वास करके मुझे आर्ट्स में प्रवेश दिलाया था। मुझे उनका विश्वास सही साबित करना था।
कॉलेज में जो भी घटनाएँ हुई थीं, उसके बारे में मैंने घर पर कुछ भी नहीं बताया था। मेरा लक्ष्य सिर्फ इतना था कि मैं सभी विषयों में पास हो जाऊँ और साल बर्बाद न हो।
कॉलेज में सब्जेक्ट चेंज का मामला काफी चर्चित हो गया था। कांबळे सर को लेक्चर न लेने के बारे में लिखित स्पष्टीकरण देना पड़ा था और कॉलेज प्रशासन ने उन्हें चेतावनी पत्र भी दिया था।
परीक्षाएँ शुरू हो गईं। सभी पेपर अच्छे गए। मैंने सभी विषयों की अच्छी तरह पढ़ाई की थी। लेकिन हिंदी की पढ़ाई की दोबारा ‘रिवीजन’ करने का समयही नहीं मिला था। रात-रात भर जागकर मैंने किसी तरह इस विषय का सिलेबस पूरा किया था। मुझे चिंता थी कि उस विषय में कितने अंक आएँगे।
कई विद्यार्थियों ने आर्ट्स सिर्फ डिग्री के लिए लिया था। उनके अनुसार आगे सिर्फ दो ही रास्ते थे, एल.एल.बी. या एम.ए.। लेकिन मुझे इन दोनों में से कुछ भी नहीं करना था।
कुछ हफ्तों बाद परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ। परिणाम वाले दिन मैं कॉलेज गया। सभी छात्र समूहों में खड़े होकर अपने परिणाम की चर्चा कर रहे थे। मेरी कक्षा के कुछ छात्र भी वहाँ खड़े थे। कुछ सभी विषयों में पास हुए थे, तो कुछ के एक-दो विषय रह गए थे।
तभी वहाँ रविंद्र आया। उसे देखते ही सबने खुशी मनानी शुरू कर दी। सभी को पूरा विश्वास था कि वही टॉपर बनेगा।
सबका अभिनंदन स्वीकार करके वह अपना परिणाम लेने गया।
मैं भी थोड़ी देर दोस्तों से बात करके अपना परिणाम लेने जा रहा था। रास्ते में रविंद्र मिला। उसके चेहरे से खुशी झलक रहा थी।
मुझे देखते ही उसने हाथ में रिजल्ट हिलाते हुए कहा,
“टॉप आया हूँ।”
“बधाई हो!” मैंने कहा,
वह मेरी तरफ देखे बिना ही दोस्तों के बीच चला गया। सभीने उसे कंधों पर उठा लिया और खुशी मनाने लगे।
मैं अपना रिजल्ट लेने ऑफिस के पास पहुँचा। तभी हिंदी की प्राध्यापिका वहाँ आईं। छात्रोंकी की खुशी देखकर वे बोलीं,
“लगता है रविंद्र फर्स्ट आया है।”
“हाँ, वह अभी अपना रिजल्ट लेकर गया है। उसने मुझे बताया कि वह फर्स्ट आया है।”
“तुमने अपना रिजल्ट लिया? मालूम है हिंदी में तुम्हें कितने मार्क्स मिले हैं?”
“नहीं मैडम, वही तो लेने आया हूँ।”
“रुको, मैं तुम्हारा रिजल्ट लेकर आती हूँ,” और यह कहकर वे ऑफिस के अंदर चली गईं।
मैं बाहर खड़ा इंतजार कर रहा था। मेरा दिल तेजी से धड़कने लगा, यह सोचकर कि नतीजा क्या होगा।
आज परीक्षा परिणाम का दिन था, इसलिए मैं सुबह से ही बहुत तनाव में था। मैंने इतनी मेहनत से पढ़ाई की थी मानो यही मेरा आखिरी मौका हो। मुझे किसीभी विषय में फेल नहीं होना था, क्योंकि अगर ऐसा होता तो अन्ना का मुझ पर भरोसा पूरी तरह टूट जाता। मैं फिर कभी उनके सामने खड़ा नहीं हो पाता। मैं रात से ही भगवान से प्रार्थना कर रहा था कि मुझे सभी विषयों में पास कर दें और अन्ना के भरोसे को सही साबित करें।
तभी वे मेरा रिजल्ट लेकर बाहर आई। मैंने उनसे अपना ‘रिजल्ट‘ लेने के लिए एक कदम आगे बढ़ाया, लेकिन मेरी तरफ देखे बिना ही वे तेजी से मेरी क्लास के छात्रों की तरफ बढ़ी जो रविंद्र को अपने कंधों पर उठाए हुए उसके प्रथम आने की खुशियाँ मना रहे थे, और उन्हें मेरा रिजल्ट दिखाते हुए जोर से बोली,
“अरे सुनो… सुनो…! रविंद्र फर्स्ट नहीं आया है, धनंजय फर्स्ट आया है…!!”
यह सुनकर मैं स्तब्ध रह गया। मेरा दिल एक पल के लिए जैसे धड़कना बंद हो गया।
उस समूह का शोर एक पल में शांत हो गया। सब एक-दूसरे को आश्चर्य से देखने लगे। उन्होंने रविंद्र को अपने कंधों से नीचे उतार दिया।
मैडम ने उनकी ओर जाकर रविंद्र से उसका रिजल्ट माँगा। फिर मेरा और उसका रिजल्ट देखकर सबको दिखाया कि कक्षा में सबसे अधिक अंक मुझे ही मिले थे।
मैं कक्षा में फर्स्ट क्लास फर्स्ट आया था।
मैं अभी भी ऑफिस के दरवाज़े पर खड़ा होकर दोस्तों के उस समूह को देख रहा था। सब कुछ किसी सपने जैसा लग रहा था। मुझे अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था।
मैडम ने मुझे आवाज़ देकर उस समूह में बुलाया। सभी ने मुझसे हाथ मिलाकर बधाई देना शुरू कर दिया।
रविंद्र ने एक बार मेरी ओर देखा, लेकिन मुझसे हाथ मिलाए बिना ही वहाँ से चला गया। यह सब उसके लिए बिल्कुल अप्रत्याशित था और शायद उसे यह स्वीकार करना मुश्किल लग रहा था।
मैडम ने अभी तक मुझे मेरा रिजल्ट नहीं दिया था। उन्होंने मुझे ऑफिस की तरफ चलने को कहा और आगे बढ़ गईं।
ऑफिस के पास पहुँचकर उन्होंने कहा,
“काँग्रेच्युलेशन्स!!”
“थैंक यू, मैडम”
“पता है तुम्हें हिंदी में कितने मार्क्स मिले हैं?”
“नहीं मैडम, आपने अभी तक मुझे मेरा रिजल्ट कहाँ दिया है?”
“अरे हाँ, ये लो तुम्हारा रिजल्ट” यह कहकर उन्होंने मुस्कुराते हुए मुझे मेरा रिज़ल्ट दे दिया।
मैंने उनके हाथ से रिजल्ट लिया। सभी विषयों में मुझे सत्तर से अधिक अंक मिले थे। हिंदी में मुझे सौ में से पचानवे अंक मिले थे।
“बहुत अच्छे! तुमने बहुत अच्छी तरह से परीक्षापत्र लिखा है है। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि तुम मेरे विषय में इतने अच्छे अंक लाओगे, वह भी इतने कम समय में पढ़ाई करके।”
“मैडम, यह सब आपके मार्गदर्शन का फल है। आपका बहुत-बहुत धन्यवाद!”
वे मुस्कुराकर बोलीं,
“अरे नहीं नहीं…, तुमने भी तो बहुत मेहनत की है। यह उसी का परिणाम है।”
मैं रिजल्ट लेकर घर जाने के लिए कॉलेज से निकला। सड़क पर चलते हुए मेरे मन में बहुत सारे विचार आ रहे थे। मुझे मिली सफलता मेरे लिए बिल्कुल अप्रत्याशित थी। पिछले कुछ दिनों में हुई घटनाओं के पृष्ठभूमि में यह सफलता उभरकर आ रहा थी । मेरा दापचारी का कोर्स, तीन महीने बाद कॉलेज में दाखिला, प्रोफेसर के साथ हुई कहा-सुनी, क्रिकेट में कॉलेज की पहली जीत, बीस दिनों में हिंदी विषय का अध्ययन, ये सभी बातें मेरे मन में घूम रहा थीं।
सोचते-सोचते मैं बस में चढ़ गया। बस में ज़्यादातर कॉलेज के ही छात्र थे। कई छात्रों को को पता चल चुका था कि मैं रविंद्र को पीछे छोड़कर मेरे क्लास में फर्स्ट क्लास फर्स्ट आया हूँ। वे सभी मुझे देखते हुए आपस में बातें कर रहे थे।
घर आकर मैंने आई अण्णा को मेरा ‘रिज़ल्ट’ दिया और बताया के मैं ‘क्लास’ में ‘फर्स्ट क्लास फर्स्ट’ आया हूँ। पहले तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ। बाद में ‘रिज़ल्ट’ देखकर उनकी तसल्ली होने के बाद उन्हें बहोत ख़ुशी हुई। मैं कॉलेज के प्रथम साल में क्लास में ‘फर्स्ट क्लास फर्स्ट’ आऊंगा ऐसा उन्होंने सपने में भी सोचा नहीं था।
सच कहूँ तो मुझे भी यह उम्मीद नहीं थी… लेकिन यह हो चुका था।
कॉलेज के स्पोर्ट्स में मैंने वेटलिफ्टिंग प्रतियोगिता में तीसरा स्थान प्राप्त किया था और क्रिकेट में विश्वविद्यालय स्तर पर कॉलेज की पहली जीत में योगदान देने के लिए मुझे प्रशस्तिपत्र मिला था।
मैंने अपने पैशन (क्रिकेट) को भी संभाला और पढ़ाई को भी। पहले की तरह तराज़ू सिर्फ एक तरफ नहीं झुका था।
पढ़ाई और क्रिकेट के बीच संतुलन बनाकर मैं फर्स्ट क्लास फर्स्ट आया था।
अब मैंने इन दोनों अलग-अलग चीज़ों में संतुलन बना लिया था। ‘जिम’ में मैं खुद को गढ़ रहा था और शारीरिक तथा शैक्षणिक दोनों ही दृष्टि से खुद को संभालना सीख रहा था।
सब कुछ किसी सपने जैसा लग रहा था। कुल मिलाकर मेरे नए कॉलेज जीवन की शुरुआत बहुत अच्छी हुई थी।
इन सभी घटनाओं से गुजरते हुए मैंने एक बात अच्छी तरह समझ ली थी कि,
“कठिनाइयाँ और अपमान कभी–कभी हमारी सफलता की सीढ़ियाँ बन जाते हैं। लेकिन, सब कुछ भुलाकर, खुद पर भरोसा रखते हुए, ईमानदारी से कड़ी मेहनत करते हुए लगातार अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहने से सफलता निश्चित रूप से आपके कदमों पर आ जाती है इसका अनुभव मुझे हो गया था।“
क्रमशः…

